शारीरिक रूप से विकलांग बालकों की शिक्षा

Education of physically challenged children

शारीरिक रूप से विकलांग बालकों की शिक्षा सामान्य बालकों के साथ सम्भव नहीं। इन विकलांग बालकों को अधिगम (Learning) और समायोजन (Adjustment) सम्बन्धी विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के परिणामस्वरूप बालकों में हीन भावनाओं (Inferiority Feelings) का विकास होता है। अत: विभिन्न दृष्टिकोणों से विकलांग बालकों को विशेष शैक्षणिक सुविधाओं की आवश्यकता पड़ती है।

विभिन्न दृष्टिकोणों से विकलांग बालकों के लिए विशेष शिक्षा प्रबन्धों का वर्णन निम्नलिखित है

अपंग बालकों की शिक्षा (Education of handicapped children)

पंगु या अपंग बालकों में शारीरिक दोष होने के कारण वह अपने शरीर के विभिन्न अंगों का सामान्य प्रयोग नहीं कर सकता और यही दोष उनके कार्यों में बाधा डालते हैं। इस प्रकार के दोष बालकों की हड्डियों, ग्रन्थियों या जोड़ों (Joints) में होते हैं जो दुर्घटना या बीमारी के कारण उत्पन्न हो जाते हैं। अपंग बालकों की बुद्धि-लब्धि (IQ) कम या अधिक हो सकती है।

ऐसे बालकों की शिक्षा के लिए निम्नलिखित विशेष प्रबन्ध किए जाने चाहिए

  • अपंग बालकों का मानसिक स्तर सामान्य बालकों जैसा होता है। अत: उन्हें उनके साथ ही शिक्षा ग्रहण करने और मानसिक विकास के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
  • उनके शारीरिक दोष के अनुसार ही उनके बैठने के लिए कुर्सी-मेज की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • उन्हें विशेष व्यवसायों का प्रशिक्षण भी मिलना चाहिए ताकि वे दूसरों पर बोझ न बन सकें। उनके शारीरिक दोष का ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • विकलांग बालकों को विकलांग अंगों के डॉक्टरों के पास भेजना चाहिए ताकि विकल अंगों के ऑपरेशन द्वारा ठीक होने के अवसरों का लाभ उठाया जा सके।
  • इनके लिए कृत्रिम अंगों (Artificial organs) की व्यवस्था होनी चाहिए। इस कार्य के लिए विकलांग बालकों के माता-पिता को शिक्षित करना अति आवश्यक है।
  • विकलांग बालकों को अपनी त्रुटि के बारे में दृष्टिकोण बदलने की शिक्षा देनी चाहिए और दूसरे सामान्य लोगों के साथ सम्पर्क बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • विकलांग बालकों का संवेगात्मक समायोजन करना बहुत आवश्यक है। इनके मन में हीनभावना को दूर करना शिक्षा का केन्द्रीय उद्देश्य होना चाहिए।

 सम्पूर्ण और अर्द्ध-अन्ध बालकों की शिक्षा (Education of all and semi-blind children)

सम्पूर्ण रूप से अन्धे या आधे-अन्धे बालकों की शिक्षा के लिए शिक्षक को निम्न प्रयत्न करने चाहिए

  • इनका अन्धापन किसी ऐनक से ठीक हो सके तो इनके लिए ऐनकों का प्रबन्ध करना चाहिए।
  • बिल्कुल अन्धे बालक सामान्य शिक्षण पद्धति के अनुसार नहीं चल सकते और न ही सामान्य बालकों के साथ ये उसी प्रकार सीख सकते हैं। अत: इन्हें अन्ध-विद्यालयों में भेज देना चाहिए। वहाँ पर ऐसे बालकों की शिक्षा के लिए विशेष विधियों का प्रयोग किया जाता है।
  • ऐसे बालकों की कक्षाओं में हवा और रोशनी का उचित प्रबन्ध होना चाहिए।
  • पूर्ण रूप से दृष्टि बाधित छात्रों की शिक्षा व्यवस्था ब्रेल-लिपि तकनीक के माध्यम से होनी चाहिए।
  • श्यामपट्ट (Black Board) स्पष्ट दिखने वाले हों ताकि इन पर लिखी हुई सामग्री को ये बालक उचित प्रकार से पढ़ सकें। साथ ही, श्यामपट्ट का स्थान इतनी दूरी पर हो कि बालकों की आँखों पर किसी प्रकार का दबाव न पड़े।
  • पूर्ण या अपूर्ण अन्धे बालकों को पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा किसी हस्त-कार्य का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।

पूर्ण बहरे और अपूर्ण बहरे बालकों की शिक्षा (Education of fully deaf and deaf children)

बहरे बालक वे होते हैं जिन्हें बिल्कुल भी सुनाई नहीं देता। ये या तो जन्म से बहरे होते हैं या किसी रोग के कारण बहरे हो जाते हैं। कई बालक सुनते तो हैं लेकिन कम सुनते हैं। ऐसे बालक भी सामान्य बालकों की तरह नहीं सीख पाते।

इनकी शिक्षा की निम्नलिखित व्यवस्थाएँ होनी चाहिए

  • बहरे बालकों के लिए विशेष प्रकार के स्कूलों की व्यवस्था की जानी चाहिए। इन स्कूलों में विशेष प्रविधियों द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता है। कई शहरों में ऐसे स्कूलों की व्यवस्था भी है; जैसे-गुड़गाँव, रोहतक, दिल्ली आदि। ऐसे बालकों के माता-पिता का शिक्षण भी आवश्यक है। ऐसा एक स्कूल अमेरिका के लॉस ऐजिल्स में जॉन ट्रेसी की निदानशाला है जो डाक द्वारा ऐसा प्रशिक्षण देती है।
  • कम बहरे बालकों के लिए अलग स्कूलों की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ऐसे बालक शिक्षकों के होठों से बहुत कुछ जान सकते हैं तथा सीख सकते हैं।
  • ऐसे बालकों और शिक्षकों में अच्छे सम्बन्ध स्थापित होने चाहिए ताकि उनके समायोजन के लिए शिक्षक व्यक्तिगत ध्यान दे सकें।

हकलाने वाले या दोषपूर्ण वाणी वाले बालकों की शिक्षा (Education of children with stuttering or faulty speech)

दोषपूर्ण वाणी में हकलाना, तुतलाना, बहुत धीरे बोलना या बहुत मोटी आवाज में बोलना या बिल्कुल ही न बोलना इत्यादि दोष शामिल होते हैं। अस्पष्ट बोलना भी वाणी दोष में सम्मिलित है। इन दोषों के कारण बालकों में हीन-भावना, आत्म-विश्वास की कमी, संवेगात्मक अस्थिरता आदि का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। अत: ऐसे बालकों की विशेष शिक्षा का प्रबन्ध होना अति आवश्यक है।

इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं

  • इनके साथ सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार होना चाहिए।
  • अध्ययन की गलत आदतों पर नियन्त्रण करना आना चाहिए।
  • शल्य क्रिया के योग्य दोषों का शल्य-क्रिया द्वारा इलाज करवाना चाहिए।
  • विशेष शब्दों का उच्चारण बार-बार कराया जाना चाहिए।
  • कई बार बिल्कुल न बोलने वाले बालकों को या तो बिल्कुल ही सुनाई नहीं देता या फिर वे कम सुनते हैं।
  • बोलने और सुनने में गहरा सम्बन्ध होता है। अत: ऐसे बालकों को श्रवण-सामग्री (Hearing Aids) द्वारा सुनने के योग्य बनाकर उनकी वाणी में सुधार किया जा सकता है।

शारीरिक रूप से निर्बल बालकों की शिक्षा (Education of physically challenged children)

  •  ऐसे बालकों को कोई रोग या इनमें कोई शारीरिक दोष तो नहीं होता, परन्तु इनका स्वास्थ्य इतना सुदृढ़ नहीं होता है। इन्हें स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
  • इस निर्बलता का कारण दोषपूर्ण पालन-पोषण, असन्तुलित भोजन या छूत के रोगों का आक्रमण होता है।
  • ऐसे बालकों की शिक्षा के लिए डॉक्टरी परीक्षण और मनोवैज्ञानिक ढंग की शिक्षण-विधियों की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • ऐसे बालकों को सन्तुलित भोजन व स्वस्थ पालन-पोषण आवश्यक है।

शारीरिक रूप से विकलांग बालकोंकी समस्याएँ (Problems of physically challenged children)

  •  शारीरिक दोषों के परिणामस्वरूप बालकों को हर क्षेत्र में समायोजन सम्बन्धी कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यदि कक्षा में कोई शारीरिक रूप से अपंग बालक हो, तो उसके कक्षा में प्रवेश एवं उसके बैठने के लिए समुचित व्यवस्था किया जाना सर्वाधिक आवश्यक है। ऐसे बालकों के लिए कक्षा में विशेष प्रकार की कुर्सी-मेज की व्यवस्था करनी चाहिए।
  • दृष्टि दोष युक्त छात्रों को भी बैठने की समस्या का सामना करना पड़ता है, इसलिए इनकी समस्याओं को समझते हुए इन्हें कक्षा में उपयुक्त स्थान पर बैठाया जाना चाहिए ताकि इन्हें कक्षा की कार्यवाही को समझने में कठिनाई न हो। • दोषपूर्ण वाणी वाले बच्चों को हीन भावना की समस्या का सामना करना पड़ता है। अत: ऐसे बालकों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

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