पिछड़े बालकों की शिक्षा

Education of backward children

स्टोन्स के शब्दों में “आजकल पिछड़ेपन के क्षेत्र में किया जाने वाला अधिकांश अनुसन्धान यह सिद्ध करता है कि उचित ध्यान दिए जाने पर पिछड़े बालक शिक्षा में प्रगति कर सकते हैं।” कक्षा में शिक्षक को पिछड़े बालकों की उपस्थिति के कारण कई प्रकार की समायोजन सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अत: इन समस्याओं के निवारण के लिए विशेष शिक्षा कार्यक्रमों की आवश्यकता पड़ती है। स्कूल में शिक्षार्थी इस सम्बन्ध में क्या कर सकता है?

इसका वर्णन निम्न प्रकार से किया जा सकता है

 व्यक्तिगत ध्यान (Individual Attention)

  •  पिछड़े बालकों की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि ये बालक सामान्य बालकों से बहुत पीछे रह जाते हैं और शिक्षक द्वारा दिया गया सामूहिक निर्देशन समझ नहीं पाते।
  • इसके अतिरिक्त इनमें हीन भावनाएँ भी विकसित हो जाती हैं जिसके कारण ये बालक शिक्षक के पास जाते हुए झिझकते या डरते हैं। अत: इनकी ओर व्यक्तिगत ध्यान देकर इन्हें पिछड़ेपन से मुक्ति दिलाई जा सकती है।

हस्त उद्योग (Hand industry)

  • पिछड़े बालक चूँकि शैक्षणिक तौर पर पीछे रह जाते हैं जिसकी वजह से वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाते, अत: उन्हें हस्त-उद्योगों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
  • इससे उनमें आत्म-विश्वास में वृद्धि होगी और स्कूल की शिक्षा पूरी करने के पश्चात् वे किसी व्यवसाय को शुरू करके स्वयं को स्थापित कर सकते हैं और अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं।

 

विशेष स्कूलों या कक्षाओं की व्यवस्था (Provision of special schools or classrooms)

  • पिछड़े बालकों की शिक्षा के लिए विशेष स्कूलों या विशेष कक्षाओं की व्यवस्था से भी इस समस्या पर नियन्त्रण पाया जा सकता है। इन बालकों को सामान्य बालकों से अलग कर दिया जाए तो शिक्षार्थी इनकी ओर विशेष ध्यान दे सकता है, लेकिन इस सुझाव की आलोचना भी की गई है। विद्वानों के अनुसार यह कदम मनोवैज्ञानिक नहीं होगा। इससे पिछड़े बालकों को सामान्य या प्रतिभाशाली बालकों से कुछ सीखने या उनका अनुसरण करने का अवसर कभी नहीं मिल पाएगा।
  • उन्हें अलग करके उन्हें इस बात का बार-बार अहसास होता रहेगा कि वे पिछडे हए बालक हैं और उनमें हीन भावना विकसित हो जाएगी। पिछड़े बालकों को सामान्य या प्रतिभावान बालकों के सम्पर्क में अवश्य रखना चाहिए।

विशिष्ट पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियाँ (Specialized courses and teaching methods)

पिछड़े बालकों की शिक्षा के लिए सामान्य पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियाँ सफल नहीं हो सकतीं। इनके लिए विशेष प्रकार का पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियाँ प्रयोग की जानी चाहिए। इनकी विशेष शिक्षा के लिए विशेष प्रकार के प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए। पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा हस्त-कार्यों पर अधिक बल दिया जाना चाहिए।

शिक्षा-मनोवैज्ञानिकों की सहायता लेना (Seeking the help of education-psychologists)

पिछड़े बालकों की शिक्षा के लिए अनुभवी शिक्षा-मनोवैज्ञानिकों की सेवाएं ली जा सकती हैं। ये शिक्षा-मनोवैज्ञानिक बालकों और उनके माता-पिता को उचित राय देकर उन्हें पिछड़ेपन से मुक्ति दिला सकते हैं।

 निर्देशन सेवाओं की व्यवस्था (Guidance services)

पिछड़े बालकों की शिक्षा के लिए स्कूलों में निर्देशन सेवाओं का संगठन बहुत लाभकारी और प्रभावपूर्ण कदम हो सकता है। स्कूलों में शैक्षिक और व्यावसायिक (Educational and Vocational Guidance) निर्देशन की व्यवस्था की जा सकती है। इन सेवाओं का प्रचार पिछड़े बालकों के माता-पिता तक भी किया जाना चाहिए। इन सेवाओं से बालक अपनी शैक्षिक और व्यावसायिक समस्याओं का समाधान करके सामान्य बालकों की पंक्ति में शामिल हो सकता है।

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