द्वितीय विश्वयुद्ध और हरियाणा

3 सितंबर, 1939 को इंग्लैंड ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। युद्ध की घोषणा के कुछ ही घंटों के दौरान वायसराय लार्ड लिनलिथगा ने भारत को भी इस युद्ध में धकेल दिया। इसके साथ ही ब्रतानी संसद ने ‘डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट’ पास करके वायसराय को बिना मुकदमा चलाए आजीवन निर्वासन और मृत्युदण्ड तक की सजा देने की तानाशाही शक्तियाँ दे दी। कांग्रेस ने सरकार के निर्णय को अमान्य करार दा… हए सरकार से आश्वासन मांगा कि युद्ध के बाद भारत में लोकतान्त्रिक सरकार की स्थापना की जाएगी। इस प्रस्ताव के समर्थन में 1 अक्तूबर, 1939 को कांग्रेस की सभी प्रांतीय सरकारों ने त्यागपत्र दे दिए। परन्तु, यूनियनिस्ट पार्टी तथा अंग्रेजों के वफादार संगठनों ने युद्ध में अंग्रेजों की परी तरह सहायता करने की नीति अपनाई।

सन् 1940 के शुरुआत में हैदराबाद रेजिमेंट की एक कंपनी ने सिंगापुर में विद्रोह कर दिया। इस कंपनी में सभी सैनिक हरियाणा के अहीर थे। ये लोग इनके मुसलमान अफसर जहीर खाँ से बहुत प्रभावित थे। जहीर खाँ एक राष्ट्रवादी व्यक्ति था तथा कांग्रेस के कार्यक्रमों से प्रभावित था। अंग्रेजों ने जहीर खां को बर्खास्त कर दिया तथा अहीर कंपनी को निगरानी में रख दिया। जवानों ने अपनी बैरक के आगे बैठकर ही भूख-हड़ताल शुरू कर दी। इनके साथ इसी रेजिमेंट की एक जाट कंपनी भी सम्मिलित हो गई। इन राष्ट्रवादी सैनिकों का विद्रोह जनरल थिमैय्या के बीच-बचाव करने से ही शांत हो पाया।

अक्तूबर, 1940 में गाँधी जी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह छेड़ दिया। आचार्य विनोबा भावे पहले सत्याग्रही बने। आन्दोलन के समर्थन में हिसार में गोपीचद भार्गव, नेकीराम शर्मा, चौ. साहबराम, लाला शामलाल, रोहतक से पं. श्रीराम शर्मा तथा राव मंगलीराम, गुडगाँव से सैयद मतालवी तथा महाशय भगवान दास, करनाल से हमीद हुसैन और अंबाला से श्रीमती दुनीचंद तथा प्रेमप्रकाश आजाद आदि नेताओं ने अपनी गिरफ्तारियाँ दीं। आन्दोलन का दूसरा चरण 10 जनवरी, 1941 से आरंभ हुआ। इस चरण में भी हिसार जिला सत्याग्रह में सबसे आगे रहा। हिसार से बलवंतराय तायल तथा श्रीमती शामलाल सहित कुल 19 लोगों ने गिरफ्तारी दी। गुड़गाँव जिले से अब्दुल हमीद सहित कुल 18 लोग तथा रोहतक से चौ. रणबीरसिंह सहित कुल 15 लोग जेल गए।

आन्दोलन का तीसरा चरण 10 अप्रैल 1941 से शुरू हुआ। इस चरण में रोहतक जिला प्रथम स्थान पर रहा। यहाँ से कुल 73 लोगों ने गिरफ्तारियाँ दीं। आन्दोलन का अन्तिम चरण दिसंबर 1941 में तब पूरा हुआ जब गाँधी जी ने यह सत्याग्रह वापिस ले लिया।
14 जुलाई, 1942 को वर्धा (महाराष्ट्र) में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक हुई। इसमें अंग्रेजों के विरुद्ध गाँधी जी के नेतृत्व में एक और सघर्ष का प्रस्ताव पारित हुआ।

8 अगस्त, 1942 को कांग्रेस महासमिति की मुंबई में बैठक हुई जिसमें इस निर्णय पर मुहर लग गई। 9 अगस्त, 1942 की सुबह-सुबह सूर्यास्त से पूर्व ही गाँधी जी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद आदि सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जगह-जगह हड़ताल हुई, धरने-प्रदर्शन हुए तथा जुलूस निकाले गए। प्रदेश में जनता ने कई जगह रेलवे स्टेशन, डाक एवं तार घर फूंक डाले। जनता का जोश और सरकार की बर्बरता दोनों ही चरम पर थे। कांग्रेस के संगठन को अवैध घोषित कर दिया गया। अकेले रोहतक जिले से 228 लोगों ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तारियाँ दीं। दूसरे स्थान पर गुड़गाँव जिला था जहाँ से 111 गिरफ्तारियाँ

 

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