दुजाना रियासत

वर्तमान झज्जर जिले की दुजाना रियासत आजादी से पूर्व हरियाणा में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती थी। दुजाना रियासत की नींव 1806 ई. में अब्दस समद खां नामक एक युसुफजई पठान ने रखी थी। 1764 ई. में जन्मा अब्दुस समद खां मराठा सरदार बाजीराव पेशवा की फौज में रिसालदार के रूप में सेवाएँ देता था। धीरे-धीरे वह मराठा सेना में उच्च पद तक जा पहुँचा। परन्तु, उसकी महत्त्वाकांक्षा कम नहीं हुई। सिंधिया शासकों की अंग्रेजों के साथ लड़ाई में उसने जनरल लेक का साथ दिया। जीत के बाद अंग्रेजों ने समद खां को यह 24 गाँव की जागीर उसकी सेवाओं के बदले बख्शीश के रूप में दे दी। 1806 ई. में एक फरमान के द्वारा उसे इस रियासत का शासक बना दिया गया।
1825 ई. में अब्दुस समद खां की मृत्यु के उपरांत नवाब मुहम्मद डोडे खेड़ा खान गद्दी पर बैठा। उसने 1850 ई. तक 25 वर्ष तक शासन किया।

दुजाना रियासत के अन्य शासक हैं

  • नवाब हसन अली खान (1850-1867 ई.)
  • नवाब सदाअत अली खान (1867-1879 ई.)
  • जलालुद्दीन नवाब मुहम्मद मुमताज अली खान (1879-1908 ई.)
  • जलालुद्दीन नवाब मुहम्मद खुर्शीद अली खान (1908-1925 ई.)
  • जलालुद्दीन नवाब मुहम्मद इक्तीदार अली खान (1908-1948 ई.)

नवाब इक्तीदार अली खां एक शोषक तथा व्याभिचारी व्यक्ति था। उसने जनहित के लिए कुछ नहीं किया। अपने शौक पूरे करने के लिए नवाब ने जनता पर भारी कर थोंप रखे थे। नवंबर 1945 में जनता ने नवाब के अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए दुजाना में भी प्रजामण्डल की स्थापना की। दुजाना प्रजामण्डल का केन्द्र कोसली के निकट नाहड़ में था। राव देवकरणसिंह दुजाना प्रजामंडल के अध्यक्ष थे और राव सरदार सिंह इसके सचिव बने। प्रजामण्डल के नेताओं में राव नेकीराम, पं. हरिराम, पं. ताराचन्द, महाशय रामजीलाल, हकीम मंगतूराम आदि प्रमुख थे। प्रजामण्डल ने रियासत में ‘कर न दो’ आन्दोलन चलाया। कर जमा न होने से नवाब की आर्थिक स्थिति डगमगाने लगी। उसने प्रजामण्डल के प्रति बड़ी सख्ती दिखाई। नवाब ने दुजाना प्रजामण्डल के सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार करवा दिया। राव नेकीराम, पं. ताराचंद आदि नेता भूमिगत रहकर कार्य करते रहे। नवाब के तमाम प्रयासों के बावजूद आंदोलन का दमन नहीं हो पाया। लोगों ने जलसे-जुलूस निकालकर नवाब की नीतियों का विरोध किया। प्रजा ने नवाब को प्रजामण्डल के नेताओं को रिहा नहीं किए जाने की स्थिति में जन-सत्याग्रह की चेतावनी दी। जनता के दबाव में उसने 8 दिसंबर, 1946 को प्रजामण्डल के सभी नेताओं को छोड़ दिया। आजादी के बाद नवाब पाकिस्तान चला गया तथा मार्च, 1948 में दुजाना रियासत का रोहतक जिले में विलय हो गया।

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