बालकों में वैज्ञानिक गुणों का विकास

Development of scientific qualities in children

किसी भी बालक की सही परीक्षा तभी होती है जब वह समाज में अपनी सीखी गई बातों को व्यावहारिक परिस्थिति में प्रयोग में लेता है। यह बालक तभी कर सकता है जब उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न किया जाए। यह प्रणाली परम्परागत प्रणाली से सर्वथा भिन्न है। शिक्षक कक्षा में छात्रों से निरीक्षण, तुलना और प्रयोग करवाकर परिणाम निकलवाता है। इसमें परिणाम या निष्कर्षों को पूर्व में प्रस्तुत नहीं किया जाता, अपितु शिक्षार्थी स्वयं प्रयोग, तुलना और निरीक्षण द्वारा परिणाम पर पहुँचने की कोशिश करता है। अध्यापक का कार्य पूरक कथनों द्वारा स्पष्टीकरण एवं पुष्टि कर, सही दिशा-निर्देश देना है।

एक अन्वेषक के रूप में बालक अपनी समस्याओं की खोज निम्नलिखित रूप से करता है

  • निरीक्षण-  सर्वप्रथम वह विषय-वस्तु की परिस्थितियों का निरीक्षण करता है।
  • तुलना विषय–  वस्तु की परिस्थितियों से तुलना करता है।
  • प्रयोग निरीक्षण,   तुलना के आधार पर विचारों का प्रयोग करता है।
  • प्रदर्शन निरीक्षण,  तुलना के आधार पर प्राप्त प्रयोग का प्रदर्शन करता है।
  • सामान्यीकरण  प्रयोग द्वारा उत्पन्न तथ्यों का परिणाम के रूप – में सिद्धान्त निर्मित करता है।
  • प्रमाणीकरण  पुनः प्रयोग द्वारा वह समस्या का प्रमाणीकरण करता है।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *