वंचित बालक

Deprived child

वंचन का तात्पर्य है कि जब किसी बालक की समाज में रहते हुए सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति न हो सके। जब उनसे उसे वंचित रहना पड़े, तब वह वंचित बालक होता है।

  • वंचित (Deprived) एक विस्तृत पद है, जिसका सामान्य अर्थ-जीवन की सामान्य सुख-सुविधाओं से अलाभान्वित रह जाना है। इस अर्थ में प्रत्येक बालक को एक वंचित बालक कहा जा सकता है; क्योंकि कुछ-न-कुछ सुख-सुविधा से प्रत्येक बालक अलाभान्वित रह जाता है।
  • परन्तु, शिक्षा मनोवैज्ञानिकों ने ‘वंचित’ का इतना विस्तृत अर्थ न रखकर एक ठोस एवं उपयोगी अर्थ बतलाया है कि वंचित बालक ऐसे बालक को कहा जा सकता है, जो सामाजिक-आर्थिक रूप से तथा सांस्कृतिक रूप से अलाभान्वित समुदाय से आते हैं।
  • भारत में अधिकतर दलित एवं आदिवासी जाति के समुदाय से आने वाले बालकों को वंचित बालक की श्रेणी में रखा जाता है।
  • भारत में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति समुदाय में लगभग 90% परिवार ऐसे हैं, जो सामाजिक-आर्थिक तथा सांस्कृतिक रूप से पिछड़े हुए हैं और ऐसे परिवार के बालकों को वंचित बालक की संज्ञा दी जाती है।
  • वंचित बालक की तुलना में एक-दूसरी तरह के भी बालक हैं, जो सामाजिक-आर्थिक रूप से सबल एवं सांस्कृतिक रूप से विकसित समुदाय से आते हैं। इन्हें अवंचित अथवा लाभान्वित बालक कहा जाता है।

वंचित बालकों की पहचान (Identification of underprivileged children)

  •  सामान्यतः आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक सुविधाओं की ओर वंचन का प्रत्यय संकेत करता है। अर्थात् ऐसे बच्चों की सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पिछड़ी होती है जिनके परिणामस्वरूप इनकी पहचान की जा सकती है।
  • ऐसे बालकों में बाल्यावस्था से ही उद्दीपक दशाओं की न्यूनता होती है। जो इनमें ज्यादातर आगे की अवस्था तक बनी रहती है।
  • ऐसे बालक सामाजिक रूप से काफी पिछड़े होते हैं।
  • ऐसे बालकों के माता-पिता ज्यादा शिक्षित नहीं होते हैं।
  • ऐसे बालकों की पारिवारिक पृष्ठभूमि रूढ़िवादी होती है।

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