संज्ञानात्मक/सामाजिक अधिगम सिद्धान्त

Cognitive / social learning theory

संज्ञान शब्द की व्युत्पत्ति संज्ञ धातु से हुई है जिसका अर्थ है जानना अथवा अवबोधन करना। संज्ञानात्मक सिद्धान्त के अन्तर्गत इस बात की विवेचना की जाती है कि व्यक्तियों में स्वयं के प्रति तथा अपने वातावरण के प्रति विवेक किस प्रकार विकसित होता है और वे अपने वातावरण के परिप्रेक्ष्य में कैसे कार्य करते हैं? संज्ञानात्मक सिद्धान्तवादियों के अनुसार अध्यापन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा विद्यार्थी में विवेक या अन्तर्दृष्टि का विकास होता है। कक्षा सम्बन्धी अनुभवों को विद्यार्थी के व्यक्तिगत लक्ष्यों से सम्बन्धित कर दिया जाता है। संज्ञानात्मक उपागम अधिगम में बोध को बल व महत्त्व दिया जाता है। इस उपागम के अनुसार अधिगम एक जटिल प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप संज्ञानात्मक संरचना में परिवर्तन आ जाते हैं। अर्थात् हम कह सकते हैं कि अधिगम संज्ञानात्मक संरचना में आया परिवर्तन है।

  • सामाजिक अधिगम का सिद्धान्त आचरण एवं व्यवहार का परिवेश के साथ प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह सिद्धान्त व्यवहार का वर्णन एक सीमा तक सिर्फ या तो प्रकृति (nature) या पालन-पोषण (nurture) से करता है, और यह कोशिश करता है कि मानव व्यवहार के जटिलता को कम न आँका जाए।
  • यह सिद्धान्त इस बात बल देता कि व्यवहार की उत्पत्ति, आनुवंशिकी या प्रकृति और वातावरण या पालन-पोषण के परस्पर सम्बन्ध से होती है।
  • यह सिद्धान्त मुख्य रूप से पोषण पर बल देता है। अत: यह कहा जा सकता है कि सामाजिक अधिगम का सिद्धान्त पूरे तरीके से व्यवहार की व्याख्या नहीं करता है।

डोलार्ड और मिलर का सामाजिक अधिगम/संज्ञानात्मक सिद्धान्त (Dollard and Miller’s Social Learning / Cognitive Theory)

इस सिद्धान्त का प्रतिपादक डोलार्ड और मिलर (John Dollard and Neal Miller) हैं। इनके अनुसार, बच्चे का जैसे-जैसे । विकास होता है, वह अधिगम (सीखना) करता जाता है। इन्होंने बाल्यावस्था के अनुभवों को वयस्क व्यक्तित्व के महत्त्वपूर्ण कारकों के रूप में स्वीकार किया है। इन्होंने अचेतन कारकों के अतिरिक्त चिन्ता और अधिगमित भय को व्यक्तित्व गतिशीलता में बहुत अधिक महत्त्व दिया है। इनके अनुसार भोजन, पानी, ऑक्सीजन और ताप कुछ अर्जित आवश्यकताएँ हैं, परन्तु इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अर्जित व्यवहार पूर्णत: पर्याप्त नहीं होता है। अत: बालक को अधिक जटिल व्यवहार का अधिगम इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करना होता है, उदाहरण के लिए, नवजात शिशु का स्तनपान से सम्बन्धित अर्जित व्यवहार उसकी भोजन की आवश्यकता के लिए अधिक समय तक पर्याप्त नहीं होता है, उसे भूख की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए कुछ अधिक स्तनपान के जटिल व्यवहारों को सीखना होता है। इनके अनुसार अधिगम के चार महत्त्वपूर्ण अवयव हैं अन्तर्नोद (अभिप्रेरणा), संकेत (उद्दीपक), प्रत्युत्तर (स्वयं का व्यवहार) तथा पुनर्बलन (पुरस्कार)।

  • अन्तर्नोद/अभिप्रेरणा (Insight / Motivation)-  जब किसी व्यक्ति को किसी वस्तु की आवश्यकता महसूस होती है, तो उस व्यक्ति में उस वस्तु को पाने की क्रियाशीलता बढ़ जाती है, इसके कारण उस व्यक्ति में तनाव एवं सक्रियता पहले की अपेक्षा तीव्र हो जाती है, यह अवस्था अन्तर्नोद/ अभिप्रेरणा कहलाती है। जिस व्यक्ति में जितना अधिक अन्तर्नोद होगा, उसका विकास उतना ही अधिक होगा।
  • संकेत/उद्दीपक-  संकेत एक प्रकार का उद्दीपक होता है, जो व्यक्ति की अनुक्रिया की प्रकृति को निर्धारित करता है। व्यक्ति में अधिगम के लिए आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार का उद्दीपक हो सकता है।
  • प्रत्युत्तर(स्वयं का व्यवहार) –  व्यक्ति अपनी उत्तेजना को शान्त करने के दृष्टिकोण से कार्य करना प्रारम्भ करता है। किसी लक्ष्य को लेकर व्यक्ति जितनी अधिक सकारात्मक अनुक्रिया करेगा, उतना ही वह विकास करेगा।
  • पुनर्बलन/पुरस्कार-  किसी कार्य को बार-बार दोहराने की – प्रवृत्ति को पुनर्बलन कहते हैं। यह (पुनर्बलन) सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों हो सकता है।

अल्बर्ट बैन्डूरा का सामाजिक अधिगम का सिद्धान्त (Albert Bandura’s theory of social learning)

अल्बर्ट बैन्डूरा ने यह सिद्धान्त सन् 1977 में प्रतिपादित किया तथा इस सिद्धान्त में बैन्डूरा शास्त्रीय (classical) स्फूर्त (operant) अनुबन्ध के व्यावहारवादी अधिगम सिद्धान्त से सहमत थे, बावजूद इसके इन्होंने महत्त्वपूर्ण उद्देश्य जोड़े हैं, जो हैं

  • मध्यस्थता प्रक्रिया, उत्तेजना तथा अनुक्रिया के बीच होती है।
  • व्यवहार या आचरण को परिवेश में रहकर सीखा जाता है जो प्रेक्षणात्मक अधिगम के अन्तर्गत सम्पन्न होता है।

इस सिद्धान्त में बैन्डूरा ने मुख्य रूप से अनुकरण पर बल दिया है। उन्होंने इस सिद्धान्त के तहत कुछ प्रयोग किए हैं, जो इस प्रकार हैं

प्रेक्षणात्मक अधिगम (Observational learning)

  • इसके अन्तर्गत उन्होंने बताया है प्रेक्षणात्मक अधिगम (देखकर अनुकरण करना) के माध्यम से बच्चे एक दूसरे का अनुकरण करके सीखते हैं। इस प्रकार के अधिगम में व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों को सीखता है, अत: इसे सामाजिक अधिगम भी कहा जा सकता है।
  • कभी-कभी हमारे सामने ऐसी अनेक स्थितियाँ आती हैं, जिसमें हमें यह पता नहीं चलता है कि हमें कैसा व्यवहार करना चाहिए। ऐसी स्थितियों में हम दूसरे व्यक्तियों के व्यवहारों का प्रेक्षण (observe) करते हैं तथा उनकी तरह व्यवहार करते हैं, सामान्यतया इस प्रकार के अधिगम को मॉडलिंग (modling) कहा जाता है।

बोबो डॉल प्रयोग (Bobo doll experiment)

  • बच्चे अपने आस-पास के लोगों के व्यवहारों का प्रेक्षण करते हैं, इसे बैन्ड्ररा के प्रसिद्ध बोबो डॉल प्रयोग के माध्यम
    से दर्शाया गया है।
  • एक प्रसिद्ध प्रयोग में बच्चों को पाँच मिनट की अवधि की एक फिल्म दिखाई। फिल्म में एक बन्द कमरे में बहुत से खिलौने रखे थे और उनमें एक खिलौना एक बड़ा … सा गुड्डा (बोबो डॉल) था।
  • अब कमरे में एक बड़ा लड़का प्रवेश करता है और चारों ओर देखता है। लड़का सभी खिलौनों के प्रति क्रोध प्रदर्शित करता है और बड़े खिलौने के प्रति तो विशेष रूप से आक्रामक हो उठता है। वह गुड्डे को मारता है उसे फर्श पर फेंक देता है, पैर से ठोकर मारकर गिरा देता है और फिर उसी पर बैठ जाता है।
  • इसके बाद का घटनाक्रम तीन अलग रूपों में तीन फिल्मों में तैयार किया गया। एक फिल्म में बच्चों के एक समूह ने देखा कि आक्रामक व्यवहार करने वाले लड़के (मॉडल) को पुरस्कृत किया गया और एक व्यक्ति ने उसके आक्रामक व्यवहार की प्रशंसा की।
  • दूसरी फिल्म में बच्चों के दूसरे समूह ने देखा कि उस लड़के को उसके आक्रामक व्यवहार के लिए दण्डित किया गया। तीसरी फिल्म में बच्चों के तीसरे समूह ने देखा कि लड़के को न तो पुरस्कृत किया गया है और न ही दण्डित। इस प्रकार बच्चों के तीन समूहों को तीन अलग-अलग फिल्में दिखाई गई। फिल्में देख लेने के बाद सभी बच्चों को एक अलग प्रायोगिक कक्ष में बिठाकर उन्हें विभिन्न प्रकार
    के खिलौनों से खेलने के लिए स्वतन्त्र छोड़ दिया गया।
  • इन समूहों को छिपकर देखा गया और उनके व्यवहारों को नोट किया गया। उन लोगों ने पाया कि जिन बच्चों ने फिल्म में खिलौने के प्रति किए जाने वाले आक्रामक व्यवहार को पुरस्कृत होते हुए देखा था, वे खिलौनों के प्रति सबसे अधिक आक्रामक थे। सबसे कम आक्रामकता उन बच्चों ने दिखाई जिन्होंने फिल्म में आक्रामक व्यवहार को दण्डित होते हुए देखा था।

इस प्रयोग से यह स्पष्ट होता है कि सभी बच्चों ने फिल्म में दिखाए गए घटनाक्रम से आक्रामकता सीखा और मॉडल का
अनुकरण भी किया। प्रेक्षण द्वारा अधिगम की प्रक्रिया में प्रेक्षक मॉडल के व्यवहार को प्रेक्षण करके ज्ञान प्राप्त करता है, परन्तु वह किस प्रकार से आचरण करेगा यह इस पर निर्भर करता है कि मॉडल को पुरस्कृत किया गया या दण्डित किया गया।

मध्यस्थता प्रक्रिया का सामाजिक अधिगम सिद्धान्त (Social learning theory of mediation process)

बैन्डूरा द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थता की निम्नलिखित चार प्रक्रियाएँ हैं

एकाग्रता/ध्यान (Concentration)

अगर हम इसको व्यवहार के सन्दर्भ में देखें तो एकाग्रता हमारे व्यवहार का अनुकरण करती है। हम प्रतिदिन बहुत से ऐसे व्यवहार को प्रयोग में लाते हैं, यद्यपि जो एकाग्रता से सम्बन्धित होता है। यह (एकाग्रता) उस समय के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है, जब कोई हमारे व्यवहार का अनुकरण करता है।

पुनरुत्पादन (Reproduction)

यह व्यवहार को मॉडल के रूप में प्रदर्शित करने की क्षमता है। हम अपने दैनिक जीवन में बहुत से व्यवहार को देखते हैं तथा उसका अनुकरण करने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह हमेशा सम्भव नहीं होता है। अनुकरण करने की हमारी यह प्रवृत्ति हमारी शारीरिक योग्यता के अनुसार सीमित होती है, जिस कारण हम इच्छा के होते हुए भी हम सभी प्रकार के व्यवहार का अनुकरण नहीं कर पाते हैं।

प्रतिधारणा (Conception)

प्रतिधारणा का शाब्दिक अर्थ यह होता है कि व्यवहार को अच्छे से किस तरह याद रखा जाए। व्यवहार को ध्यान में रखा जा सकता है, अपितु हमेशा याद नहीं रखा जा सकता है, जो कि अनुकरण को प्रतिबन्धित (prevent) करता है। अत: यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि व्यवहार के स्मृति (memory) को उत्पन्न किया जा सकता है, जो कि बाद में किसी पर्यवेक्षक (observer) के द्वारा दर्शाया जा सकता है। कहा जा सकता है कि बहुत से सामाजिक अधिगम तात्कालिक नहीं होते हैं, अत: प्रतिधारण प्रक्रिया इस परिस्थिति में बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

अभिप्रेरणा (Motivation)

अगर पर्यवेक्षक (observer) व्यवहार को प्रदर्शित करता है, और यह पुरस्कार रंग दण्ड को अनुसरण करता है तो इस पर विचार किया जा सकता है, पर्यवेक्षक के द्वारा अगर पुरस्कार कार्य के दृष्टिकोण से अच्छा है तो पर्यवेक्षक व्यवहार का अनुकरण करता है। यदि प्रत्याधिकृत सुदृढ़ीकरण (Reinforcement) को उतनी अधिक आवश्यकता नहीं दिया जाए तब पर्यवेक्षक व्यवहार को उतने अच्छे तरीके से अनुकरण नहीं करेगा।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *