ज्ञानात्मक व क्षेत्र संगठनात्मक सिद्धान्त

Cognitive and field organizational theory

अधिगम का यह सिद्धान्त सीखने की प्रक्रिया में उद्देश्य, अन्तर्दृष्टि और सूझ-बूझ के महत्त्व को प्रदर्शित करता है। इस प्रकार के सिद्धान्तों के अन्तर्गत वर्देमीअर, कोह्लर एवं लेविन के अधिगम सिद्धान्त आते हैं।

कोह्लर का अन्तर्दृष्टि का सिद्धान्त (Kohler’s theory of insight)

अन्तर्दृष्टि (Insight) अर्थात् सूझ-बूझ के द्वारा सीखने का सिद्धान्त गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों की देन है। इन मनोवैज्ञानिकों में वर्देमीअर, कोहर, कोफ्फका और लेविन के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। गेस्टाल्ट एक जर्मन शब्द है, जिसका अर्थ होता है एक आकृति को पूर्णता या समग्रता के रूप में लेना। गेस्टाल्टवादी सिद्धान्त को प्रतिपादित करने के लिए कोहर ने एक प्रयोग किया। कोहर ने एक कमरे में सुल्तान नामक एक भूखे चिम्पैंजी को बन्द कर दिया। उसने कमरे की छत में कुछ केले टाँग दिए, जोकि चिम्पैंजी की पहुँच के बाहर थे। उसने कमरे में तीन-चार खाली बक्से भी डाल दिए।

  • चिम्पैंजी केलों को देखकर उछल-कूदकर उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करता है, परन्तु वह केलों को प्राप्त करने में अपने को असफल पाता है। कुछ समय बाद वह फर्श पर रखे हुए खाली बक्सों को देखता है।
  • पहले वह एक बक्से को केलों के नीचे रखता है तथा वह उस बक्से पर चढ़कर केला प्राप्त करने का प्रयत्न करता है, परन्तु वह केला प्राप्त नहीं कर पाता है।
  • कुछ समय बाद वह दूसरा बक्सा भी पहले बक्से पर रखता है, परन्तु वह अब भी केले प्राप्त करने में असफल रहता है। इसके बाद उसे तीसरा बक्सा दिखाई देता है। वह तीसरे बक्से को दूसरे पर रखकर उस पर चढ़ जाता है तथा केले प्राप्त करने में सफल हो जाता है। यह उसकी अन्तर्दृष्टि ही है कि वह बक्सों को क्रम में रखकर केले प्राप्त कर लेता है।
  • एक अन्य प्रयोग में चिम्पैंजी को एक पिंजरे में बन्द कर दिया गया। पिंजरे में दो ऐसी छड़ियाँ रखी हई थीं, जिन्हें जोड़कर एक बड़ी छड़ी बनाई जा सकती थी। पिंजरे के बाहर केले रख दिए गए। चिम्पैंजी ने हाथ बढ़ाकर केले प्राप्त करने की कोशिश की, किन्तु असफल रहा।
  • छड़ियों से खेलते हुए एक बार अचानक दोनों छड़ी आपस में जुड़ गईं। अब वह बड़ी छड़ी से केले को अपनी ओर खींचने में सफल हो गया।

उपरोक्त प्रयोगों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि चिम्पैंजियों ने परिस्थितियों का अपने समग्र रूप में प्रत्यक्षीकरण किया। परिस्थितियों में उपलब्ध सामग्री तथा समस्या के हर पहलू का गम्भीरतापूर्वक विश्लेषण कर उचित सम्बन्ध स्थापित करने की चेष्टा की। अन्त में समस्याओं और उनसे सम्बन्धित पहलुओं को तुरन्त ही समझ कर उनका हल उनके मस्तिष्क में अचानक ही कौंध गया।

अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त की शैक्षिक उपयोगिता (Educational utility of insight theory)

  • जब कुछ पढ़ाया जाए अथवा कुछ सीखने के लिए कहा जाए, तो उसे अपने समग्र रूप में ही बच्चों के सामने प्रस्तुत किया जाए। बालकों के बौद्धिक विकास हेतु उनकी अन्तर्दृष्टि अथवा सूझ-बूझ बहुत सहायक होती है। इसलिए इस विधि के द्वारा अधिक-से-अधिक कार्यों को करने के लिए बालकों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • पाठ्यक्रम के निर्माण में सूझ-बूझ अथवा अन्तर्दृष्टि प्रक्रिया को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम के विभिन्न अंगों को एकीकृत किया जाता है। यदि सीखने से होने वाले लाभों का पहले से पता चल जाए, तो बालक अपनी बुद्धि तथा सूझ-बूझ का भरपूर प्रयोग करेगा।

लेविन का अधिगम सम्बन्धी सिद्धान्त (Levin’s theory of learning)

लेविन के अधिगम सम्बन्धी क्षेत्र सिद्धान्त का आधार वातावरण में व्यक्ति की स्थिति है। इस सिद्धान्त के अनुसार सीखना अथवा अधिगम एक सापेक्षिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सीखने वाले में नवीन अन्तर्दृष्टि का विकास होता है अथवा पुरानी में परिवर्तन होता है। व्यक्ति के व्यवहार को समझने हेतु व्यक्ति की स्थिति को उद्देश्यों से सम्बन्धित मानचित्र में निर्धारित करने तथा प्रयत्नों की जानकारी आवश्यक है। इस सिद्धान्त के चार मुख्य तत्त्व हैं शक्ति, अभिप्रेरणा, जीवन विस्तार एवं अवरोध।

सिद्धान्त की शैक्षिक उपयोगिता (Educational utility of theory)

  • क्षेत्र सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक अधिगमकर्ता को मात्र एक जैविक प्राणी न समझा जाकर एक ऐसा मनोविज्ञानात्मक व्यक्ति माना जाता है जो किसी एक शिक्षण अधिगम परिस्थिति में अपने विशिष्ट जीवन दायरे में रह रहा होता है।
  • क्षेत्र सिद्धान्त यह बताता है कि सीखना सभी तरह से एक उद्देश्यपूर्ण और लक्ष्योन्मुख प्रक्रिया है।
  • क्षेत्र सिद्धान्त की सहायता से शिक्षकों को शिक्षण-अधिगम व्यवस्था के उचित नियोजन, व्यवस्था तथा प्रबन्धीकरण में सहायता मिलती है।

कार्ल रोजर्स का अनुभवजन्य अधिगम सिद्धान्त (Carl Rogers Empirical Learning Principles)

कार्ल रेन्सम रोजर्स नामक अमेरिकन मनोवैज्ञानिक ने प्रौढ व्यक्तियों की अधिगम प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए अनुभवजन्य अधिगम सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उन्होंने | अधिगम को दो मुख्य प्रकारों, संज्ञानात्मक अधिगम तथा अनुभवजन्य अधिगम में विभक्त किया। उन्होंने बताया कि संज्ञानात्मक अधिगम को जब तक उपयोग में नहीं लाया जाए, यह अपने आप में पूरी तरह निरर्थक ही होता है। इस अधिगम का आधार और प्रयोजन मात्र ज्ञान की प्राप्ति ही होता है। शब्द-ज्ञान, गणितीय ज्ञान, भौगोलिक तथा ऐतिहासिक तथ्यों एवं घटनाओं की जानकारी आदि इसी प्रकार के अधिगम के अन्तर्गत आते हैं।

  • अनुभवजन्य अधिगम के बारे में कार्ल रोजर्स ने बताया कि यह मात्र ज्ञानार्जन में ही नहीं, बल्कि व्यक्ति विशेष की सम्पूर्ण प्रगति और उसके कल्याण में विशेष रूप से सहायक सिद्ध होता है। अनुभवजन्य अधिगम में अधिगमकर्ता की अपनी व्यक्तिगत रुचि एवं तल्लीनता का पूरा-पूरा समावेश पाया जाता है।
  • यह सिद्धान्त बताता है कि मानव होने के नाते व्यक्ति में सीखने की स्वाभाविक रूप से ही उत्कट अभिलाषा रहती है और सभी व्यक्ति वृद्धि एवं विकास को प्राप्त करना चाहते हैं। इसलिए अपनी स्वाभाविक रुचि तथा इच्छा को ध्यान में रखते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर रहने के लिए कुछ-न-कुछ सीखते रहने की कोशिश करते हैं।

अनुभवजन्य अधिगम सिद्धान्त की शैक्षिक उपयोगिता (Educational utility of empirical learning theory)

  • यह सिद्धान्त अधिगम हेतु उचित रूप से लाभदायक एवं सकारात्मक अधिगम परिस्थितियों का आयोजन करने में सहायक होता है।
  • इस सिद्धान्त की सहायता से छात्रों के लिए अधिगम स्रोतों एवं संसाधनों की व्यवस्था करने में सहायता मिलती है।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *