बाल विकास की अवधारणा

शिक्षाशास्त्र के दृष्टिकोण से विकास की अवधारणा एवं अधिगम दोनों एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। इसके अन्तर्गत बालकों की विभिन्न अवस्थाओं: जैसे- प्रसवपूर्व अवस्था, शैशव अवस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढावस्था इत्यादि के बारे में बताया गया है। बालकों में होने वाली वृद्धि एवं विकास इस अध्याय के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। विकास की अवधारणा के अन्तर्गत बालकों का मानसिक, सांवेगिक भाषायी एवं सामाजिक विकास होता है।

विकास की अवधारणा

विकास जीवनपर्यन्त चलने वाली एक निरन्तर प्रक्रिया है। विकास की प्रक्रिया में बालक का शारीरिक (physical) क्रियात्मक (motor) संज्ञानात्मक (cognitive) भाषागत् (language) संवेगात्मक (emotional) एवं सामाजिक (social) विकास होता है। बालक में आयु के साथ होने वाले गुणात्मक एवं परिमाणात्मक परिवर्तन सामान्यतया देखे जाते हैं। क्रमबद्ध एवं ‘ससंगत’ होना इस बात को सांकेतिक करता है कि बालक के अन्दर अब तक संघटित गुणात्मक परिवर्तन तथा उसमें आगे होने वाले परिवर्तनों में एक निश्चित सम्बन्ध है। आगे होने वाले परिवर्तन अब तक के परिवर्तनों की परिपक्वता पर निर्भर करते हैं। अरस्तू के अनुसार, “विकास आन्तरिक एवं बाह्य कारणों से व्यक्ति में परिवर्तन है।”

विकास के अभिलक्षण

विकास एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है, जो गर्भधारण से लेकर मृत्युपर्यन्त होती रहती है। मनौवैज्ञानिकों ने विकास के विभिन्न अभिलक्षणों को बताया है, जो इस प्रकार हैं।

  • विकासात्मक परिवर्तन प्रायः व्यवस्थित प्रगतिशील और नियमित होते हैं। सामान्य से विशिष्ट और सरल से – जटिल और एकीकृत से क्रियात्मक स्तरों की ओर अग्रसर होने के दौरान प्रायः यह एक क्रम का अनुसरण करते हैं।
  • विकास बहु-आयामी (multi-dimensional) होता है, अर्थात् कुछ क्षेत्रों में यह बहुत तीव्र वृद्धि को दर्शाता है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में धीमी गति से होता है।
  • विकास बहुत ही लचीला होता है इसका तात्पर्य है कि एक ही व्यक्ति अपनी पिछली विकास दर की तुलना में किसी विशिष्ट क्षेत्र में अपेक्षाकृत आकस्मिक रूप से अच्छा सुधार प्रदर्शित कर सकता है। एक अच्छा परिवेश शारीरिक शक्ति । अथवा स्मृति और बुद्धि के स्तर में अनापेक्षित सुधार ला सकता है
  • विकासात्मक परिवर्तनों में प्राय: परिपक्वता में क्रियात्मकता (functional) के स्तर पर उच्च स्तरीय वृद्धि देखने में आती है, उदाहरणस्वरूप शब्दावली के आकार और जटिलता में वृद्धि, परन्तु इस प्रक्रिया में कोई कमी अथवा क्षति भी निहित । हो सकती है। जैसे-हड्डियों के घनत्व में कमी या क्यावस्था में याददाश्त (स्मृति) का कमजोर होना।
  • विकासात्मक परिवर्तन ‘मात्रात्मक’ एवं गुणात्मक दोनों (quantitative) हो सकते हैं। जैसे-आय बढ़ने के साथ कद बढ़ना अथवा गुणात्मक’ जैसे नैतिक मूल्यों का निर्माण।
  • किशोरावस्था के दौरान शरीर के साथ-साथ संवेगात्मक, सामाजिक और संज्ञानात्मक क्रियात्मकता में भी तेजी से परिवर्तन दिखाई देते है।
  • विकास प्रासंगिक हो सकता है। यह ऐतिहासिक, परिवेशीय और सामाजिक-सांस्कृतिक घटकों से प्रभावित हो सकता है।
  • कुछ बच्चे अपनी आयु की तुलना में अत्यधिक पूर्व-चेतन (जागरूक) हो सकते हैं, जबकि कुछ बच्चों में विकास की गति बहुत धीमी होती है।
  • उदाहरणस्वरूप, यद्यपि एक औसत बच्चा 3 शब्दों के वाक्य 3 वर्ष की आयु में बोलना शुरू कर देता है, परन्तु कुछ ऐसे बच्चे भी हो सकते हैं, जो 2 वर्ष के होने से बहुत पहले ही। ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेते हैं।

बाल विकास के आयाम

मनोवैज्ञानिकों ने अध्ययन की सुविधा के दृष्टिकोण से विकास को निम्नलिखित भागों में बाँटा है

शारीरिक विकास

शरीर के बाह्य परिवर्तन; जैसे-ऊँचाई, शारीरिक अनुपात में वृद्धि इत्यादि जिन्हें स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, किन्तु शरीर के आन्तरिक अवयवों के परिवर्तन बाह्य रूप से दिखाई तो नहीं पड़ते, किन्तु शरीर के भीतर इनका समुचित विकास होता रहता है।

  • प्रारम्भ में शिशु अपने हर प्रकार के कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है, धीरे-धीरे विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप वह अपनी आवश्यकताओं की पर्ति में सक्षम होता जाता है।
  • शारीरिक विकास पर बालक के आनुवंशिक गुणों का प्रभाव देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त बालक के परिवेश एवं उसकी देखभाल का भी उसके शारीरिक विकास पर प्रभाव पड़ता है। बालक की वृद्धि एवं विकास के बारे में शिक्षकों को पर्याप्त जानकारी इसलिए रखना अनिवार्य है, क्योकि बच्चों की रुचिया, इच्छाएँ, दृष्टिकोण के आधार पर शिक्षक बच्चों का बेहतर विकास कर सकता है।
  • बच्चों की शारीरिक वृद्धि एवं विकास के सामान्य ढाँचे से परिचित होकर अध्यापक यह जान सकता है कि एक विशेष आयु स्तर पर बच्चों से क्या आशा की जा सकती है? शैशवावस्था में यह वृद्धि तेज तथा बाल्यावस्था में धीमी हो जाती है।

मानसिक विकास

  • संज्ञानात्मक या मानसिक विकास से तात्पर्य बालक की उन सभी मानसिक योग्यताओं एवं क्षमताओं में वृद्धि और विकास से है, जिनके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की समस्याओं को सुलझाने में अपनी मानसिक शक्तियों का पर्याप्त उपयोग कर पाता है।
  • कल्पना करना, स्मरण करना, विचार करना, निरीक्षण करना, अवलोकन, बुद्धितर्क, समस्या समाधान करना, निर्णय लेना इत्यादि की योग्यता मानसिक विकास के फलस्वरूप ही विकसित होते हैं।
  • जन्म के समय बालक में इस प्रकार की योग्यता का अभाव होता है, धीरे-धीरे आयु बढ़ने के साथ-साथ उसमें मानसिक विकास की गति भी बढ़ती रहती है।
  • मानसिक विकास के बारे में शिक्षक को पर्याप्त जानकारी इसलिए होनी चाहिए, क्योंकि इसके अभाव में वह बालकों की इससे सम्बन्धित समस्याओं का समाधान नहीं कर पाएगा।
  • विभिन्न अवस्थाओं और आयु-स्तर पर बच्चों की मानसिक वृद्धि और विकास को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त पाठ्यपुस्तकें तैयार करने में भी इससे सहायता मिल सकती है।

पियाजे तथा बूनर ने संज्ञानात्मक विकास के अपने-अपने सिद्धान्त प्रस्तुत किए हैं। पियाजे के अनुसार, “संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाएँ क्रमश: संवेदनात्मक गामक अवस्था, पूर्व संक्रियात्मक अवस्था, मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था तथा । औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था है।”

सांवेगिक विकास

  • संवेग, जिसे भाव भी कहा जाता है इसका अर्थ होता है ऐसी अवस्था जो व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है; जैसे- भय, क्रोध, घृणा, आश्चर्य, स्नेह, खुशी इत्यादि संवेग के उदाहरण है। बालक में आयु बढ़ने के साथ ही इन संवेगो के विकास भी होते रहते हैं।
  • संवेगात्मक विकास मानव वृद्धि एवं विकास का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। बालक का संवेगात्मक व्यवहार उसकी शारीरिक वृद्धि
    विकास को ही नहीं, बल्कि बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास को भी प्रभावित करता है।
  • बालक के सन्तुलित विकास में उसके संवेगात्मक विकास की अहम भूमिका होती है।
  • बालक के संवेगात्मक विकास पर पारिवारिक वातावरण भी बहुत प्रभाव डालता है।
  • विद्यालय के परिवेश और क्रिया-कलापों को उचित प्रकार से संगठित कर अध्यापक बच्चों के संवेगात्मक विकास में भरपूर योगदान दे सकते हैं।
  • जन्म से ही शिशु का संवेगात्मक व्यवहार आरम्भ हो जाता है। छह माह की आयु में शिशु में भय एवं क्रोध, एक वर्ष की आयु में प्रेम एवं उल्लास, डेढ़ वर्ष की आयु में ईर्ष्या, दो वर्ष की आयु में प्रसन्नता आनन्द क्रोध घृणा, इत्यादि संवेगों का विकास होने लगता है तीन वर्ष की अवस्था में बालकों में सभी संवेगों का विकास हो जाता है।

क्रियात्मक विकास

  • क्रियात्मक विकास का अर्थ होता है-व्यक्ति की कार्य करने की शक्तियों, क्षमताओं या योग्यताओं का विकास करना।
  • क्रियात्मक शक्तियों, क्षमताओं या योग्यताओं का अर्थ होता है ऐसी शारीरिक गतिविधियाँ या क्रियाएँ, जिनको सम्पन्न करने के लिए माँसपेशियों (muscles) एवं तन्त्रिकाओं (nerves) की गतिविधियों के संयोजन की आवश्यकता होती है; जैसे-चलना, बैठना इत्यादि। एक नवजात शिशु ऐसे कार्य करने में अक्षम होता है। शारीरिक वृद्धि एवं विकास के साथ ही उम्र बढ़ने के साथ उसमें इस तरह की योग्यताओं का भी विकास होने लगता है।
  • इसके कारण बालक को आत्मविश्वास अर्जित करने में भी सहायता मिलती है। पर्याप्त क्रियात्मक विकास के अभाव में बालक में विभिन्न प्रकार के कौशलों के विकास में बाधा
    पहुँचती है।
  • क्रियात्मक विकास के स्वरूप एवं उसकी प्रक्रिया का ज्ञान
    होना शिक्षकों के लिए आवश्यक है। जिन बालकों में क्रियात्मक विकास सामान्य से कम होता है, उनके समायोजन
    एवं विकास हेतु विशेष कार्य करने की आवश्यकता होती है।

भाषायी विकास

  • भाषा के विकास को एक प्रकार से संज्ञानात्मक (भावनात्मक) विकास माना जाता है।
  • भाषा के माध्यम से बालक अपने मन के भावों, विचारों को एक-दूसरे के सामने रखता है एवं दूसरे के भावों, विचारों एवं भावनाओं को समझता है।
  • भाषायी ज्ञान के अन्तर्गत बोलकर विचारों को प्रकट करना, संकेत के माध्यम से अपनी बात रखना तथा लिखकर अपनी बातों को रखना इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है।
  • बालक 6 माह से 1 वर्ष के बीच कुछ शब्दों को समझने एवं बोलने लगता है। 3 वर्ष की अवस्था में वह कुछ छोटे वाक्यों को बोलने लगता है। 15 से 16 वर्षों के बीच काफी शब्दों की समझ विकसित हो जाती है। भाषायी विकास क्रमिक रूप से होता है। इसके माध्यम से कौशल में वृद्धि होती है।

सामाजिक विकास

  • सामाजिक विकास का शाब्दिक अर्थ होता है-समाज के अन्तर्गत रहकर विभिन्न पहलुओं को सीखना अर्थात् समूह के स्तर पर परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों के अनुकूल स्वयं को ढालना, एकता, मेल-जोल तथा पारस्परिक सहयोग की
    भावना को आत्मसात करना।
  • समाज के अन्तर्गत ही चरित्र निर्माण तथा जीवन से सम्बन्धित व्यावहारिक गुणों इत्यादि का विकास होता है। बालकों के विकास की प्रथम पाठशाला परिवार को माना गया है, तत्पश्चात् समाज को एक दूसरे के सम्पर्क में आने से समाजीकरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। सामाजिक विकास के माध्यम से बालकों का जुड़ाव व्यापक हो जाता है। सम्बन्धों के दायरे में वृद्धि अर्थात् माता-पिता एवं
    भाई-बहन के अतिरिक्त दोस्तों/मित्रों से जुड़ना।
  • सामाजिक विकास के माध्यम से बालकों में सांस्कृतिक, धार्मिक तथा सामुदायिक इत्यादि भावनाएँ उत्पन्न होती हैं।
  • बालकों के मन में आत्म-सम्मान, स्वाभिमान तथा विचारधारा का जन्म होता है।
  • बालक समाज के माध्यम से ही अपने आदर्श व्यक्तियों का चयन करता है तथा कुछ बनने की प्रेरणा उनसे लेता है।

बाल विकास की विभिन्न अवस्थाएँ

प्रत्येक बच्चे के विकास की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। इन्हीं अवस्थाओं में बच्चों का एक निश्चित विकास होता है। विकास की इस सीमा को ध्यान में रखते हुए विकास को निम्नलिखित चरणों में विभाजित करने का प्रयास किया गया है

  • शैशवावस्था जन्म से 2 वर्ष तक
  • प्रारम्भिक बाल्यावस्था 3 से 9 वर्ष
  • मध्य बाल्यावस्था 6 से 9 वर्ष
  • उत्तर बाल्यावस्था 9 से 12 वर्ष
  • पूर्व किशोरावस्था प्रारम्भिक 11 से 15 वर्ष तक
  • किशोरावस्था बाद की अवस्था 15 से 19 वर्ष तक
  • वयस्क 18 वर्ष के बाद

रॉस के अनुसार, बालक के विकास की निम्नलिखित चार महत्त्वपूर्ण अवस्थाएँ होती हैं

  • शैशवावस्था –  1 से 5 वर्ष
  • बाल्यावस्था – 5 से 12 वर्ष
  • किशोरावस्था – 12 से 18 वर्ष
  • प्रौढ़ावस्था – 18 वर्ष से ऊपर

मानव विकास की अवस्थाओं

की प्रमुख विशेषताएँ मानव विकास, विकास की विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरता है। विकास की प्रत्येक अवस्था विकासात्मक मनोविज्ञान के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण विषय है। इनमें से कुछ प्रमुख अवस्थाओं का विवरण निम्नवत् है

गर्भावस्था

प्रायः गर्भावस्था 9 माह या लगभग 280 दिनों तक रहती है। इस अवस्था को गर्भाधान से शिशु जन्म तक की अवधि को माना जाता है। गर्भावस्था में विकास की गति तीव्र होती है। शरीर के सभी अंगों की आकृतियों का निर्माण इस काल में हो जाता है। गर्भावस्था का विकास माँ के खान-पान से अधिक प्रभावित होता है।

अध्ययन की दृष्टि से सम्पूर्ण गर्भावस्था को तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं

  • डिम्बावस्था (Germinal stage) – यह अवस्था गर्भाधान से दो सप्ताह तक रहती है। इसका आकार अण्डे के समान होता है और यह इधर-उधर नालिका में तैरता रहता है, जो माँ के गर्भाशय तक जाती है। गर्भनाल के द्वारा माँ के रुधिर प्रवाह से डिम्ब अपना आहार प्राप्त करता है।
  • पिण्डावस्था (Embryonic stage) –  यह अवस्था तीसरे सप्ताह से दूसरे महीने के अन्त तक रहती है। इस अवस्था में गर्भ पिण्ड मानव आकृति धारण कर लेता है। इसमें विकास गति तीव्र होती है। 6 सप्ताह का गर्भपिण्ड होने पर, उसमें हृदय की धड़कन प्रारम्भ हो जाती है। स्नायुमण्डल, ज्ञानतन्तु, त्वचा, ग्रन्थियाँ, बाल, फेफड़ा, जिगर, साँस नली आदि का निर्माण होता है इस अवस्था में गर्भनाल में फैलाव आता है।
  • भ्रूणावस्था (Fetal stage) –  यह अवस्था तीन माह से नौ माह तक रहती है। इस अवस्था में किसी नवीन अंग का विकास नहीं होता, बल्कि पिण्डावस्था में निर्मित अंगों का विकास होता है। इस अवस्था में मानव शिशु की आकृति का पूर्ण विकास होता है।

शैशवावस्था

  • इस अवस्था को बालक का निर्माण काल माना जाता है। यह अवस्था जन्म से दूसरे वर्ष तक मानी जाती है।
  • फ्रायड के अनुसार, “मानव को जो कुछ भी बनना होता है वह प्रारम्भिक पाँच वर्षों में ही बन जाता है।”
  • इस अवस्था में बालक अपरिपक्व होता है तथा दूसरों पर पूर्णतया निर्भर रहता है।
  • उसका व्यवहार पूरी तरह प्रवृत्ति से जुड़ा होता है, जिसकी सन्तुष्टि वह तुरन्त चाहता है। सुख की चाह उसका एकमात्र प्रेरक होता है।

शैशवावस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं:

  • शारीरिक विकास की तीव्रता
  • मानसिक क्रियाओं की तीव्रता
  • सीखने की प्रक्रिया की तीव्रता
  • दूसरों पर निर्भरता
  • आत्म-प्रेम की भावना
  • सामाजिक भावनाओं का तीव्र विकास
  • अनुकरण द्वारा सीखने की प्रवृत्ति
  • संवेगों का प्रदर्शन

बाल्यावस्था

  • यह अवस्था तीन से बारह वर्ष की अवधि तक मानी जाती है। इस अवस्था में बालक में अनेक अनोखे परिवर्तन होते हैं इसीलिए विकास की दृष्टि से इस अवस्था को एक जटिल अवस्था माना जाता है।
  • मनोवैज्ञानिकों ने इस अवस्था को जीवन का अनोखा काल माना है। इस अवस्था में सामाजिकता का अधिकतम विकास हो जाता है।
  • बालक में नैतिकता भी विकसित हो जाती है, जिससे वह उचित अनुचित का निर्णय कर सकता है। बालक आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ परिपक्व भी होने लगता है। इस अवस्था में मित्र बनाने की इच्छा प्रबल होती है।
  • बाल्यावस्था में अपने समूह के प्रति बड़ी ही आस्था होती है। उसमें आपस में सहयोग, प्रेम, सहानुभूति का भाव विकसित होता है। बाल्यावस्था में बहुत प्रकार की रुचियाँ भी विकसित होती हैं।

बाल्यावस्था की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार से हैं

  • मानसिक योग्यता में वृद्धि
  • जिज्ञासा की प्रबलता
  • वास्तविक जगत् से सम्बन्ध
  • सामाजिक गुणों का विकास
  • नैतिक गुणों का विकास
  • बहिर्मुखी व्यक्तित्व का विकास
  • सामूहिक खेलों में रुचि शारीरिक एवं मानसिक स्थिरता

किशोरावस्था

  • यह अवस्था जीवन का सन्धिकाल है। किशोरों तथा किशोरियों में काम भावना के लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं।
  • किशोर तथा किशोरियाँ अपने को अच्छा दिखाने के लिए सजते सवँरते हैं जिससे विपरीत लिग का आकर्षण उनके प्रति बढे। यह अवस्था तनाव. तुफान तथा स्वप्न की अवस्था कही जाती है. जिसमें विरोधी प्रवृत्तियों का विकास होता है।
  • किशोरावस्था की अवधि कल्पनात्मक तथा भावनात्मक होती है। यहीं पर जीवन साथी की तलाश होती है।
  • अधिकारियों, अभिभावकों तथा शिक्षकों के प्रति विरोध की भी प्रवृत्ति पाई जाती है। पूर्व किशोरावस्था में काल्पनिक जीवन अधिक होता है, लेकिन उत्तर किशोरावस्था में व्यवहार में स्थायित्व आने लगता है।
  • अनुशासन तथा सामाजिक नियन्त्रण का भाव विकसित हो जाता है। कुल मिलाकर इस अवस्था का सबसे बड़ा ऋणात्मक पहलू यह है कि इसमें समायोजन की क्षमता कम पाई जाती है।
  • किशोरावस्था में इच्छाएँ पूरी न होने पर पलायनवादी प्रवृत्ति होती है, जिसमें भावनाओं में बहकर आत्महत्या का भाव भी इस अवस्था में अधिक दिखाई देता है।

किशोरावस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं

  • शारीरिक परिवर्तन
  • अत्यन्त जटिल अवस्था
  • घनिष्ठ व व्यक्तिगत मित्रता
  • स्थिरता व समायोजन का अभाव
  • स्वतन्त्रता व विद्रोह की भावना
  • काम शक्ति की परिपक्वता
  • रुचियों में परिवर्तन एवं स्थिरता
  • ईश्वर व धर्म में विश्वास – 12 से 18 वर्ष के बीच की अवस्था
  • नशा या अपराध की ओर उन्मुख होने की सम्भावना।

प्रौढ़ावस्था

  • यह अवस्था व्यावहारिक जीवन की अवस्था कही जाती है इसमें पारिवारिक जीवन या गृहस्थ जीवन की गतिविधियाँ होती हैं। जिसमें कल्पनाएँ नहीं रह जातीं वरन् वास्तविक जीवन की अन्त:क्रियाएँ होती हैं। व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है। उसकी बहुत प्रकार की प्रतिभाएँ उभरकर सामने आती हैं। व्यक्ति अपने विशिष्ट क्षेत्र में कौशल दिखाता है।
  • इस अवस्था में उसे अनेकों प्रकार के संघर्ष तथा समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उसे तरह-तरह के उत्तरदायित्व का निर्वाह भी करना पड़ता है। यह अवस्था सामाजिक तथा व्यावसायिक क्षेत्र के विकास की उत्कष्ट अवस्था होती है। सबसे अधिक विकास इसी अवस्था में होता है।

वृद्धावस्था

  • यह अवस्था बाल्यावस्था की तरह अत्यधिक संवेदनशील (Sensitive) मानी जाती है।
  • उत्तरदायित्व समाप्त करने के बाद व्यक्ति इस अवस्था में आध्यात्मिक चिन्तन की ओर बढ़ता है। शारीरिक क्षमताएँ कम होने लगती हैं।
  • स्मरण शक्ति का कमजोर होना, निर्णय की क्षमता में | कमी, जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं। वृद्धावस्था में समायोजन का भी अभाव पाया जाता है क्योंकि नई पीढ़ी के साथ उसके मूल्यों का टकराव भी होता है। कभी-कभी अपने को असहाय एवं उपेक्षित भी अनुभव करते हैं।
  • वृद्धावस्था में तरह-तरह के शारीरिक मानसिक परिवर्तन होते हैं, बीमारियाँ भी इस अवस्था में अधिक होती हैं। तनाव, उच्च रक्तचाप, ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों की क्षमता तथा शक्ति की कमी के लक्षण दिखाई देते हैं।

वृद्धि एवं विकास का अर्थ

‘वृद्धि’ और ‘विकास’, दोनों शब्द प्रायः एक ही अर्थ में प्रयोग किए जाते हैं, किन्तु मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इनमें कुछ अन्तर होता है। सोरेन्सन (Sorenson) के विचार में, ‘अभिवृद्धि’ शब्द का प्रयोग सामान्यत: शरीर और उसके अंगों के भार तथा आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है। इस वृद्धि को नापा और तोला जा सकता है। विकास का सम्बन्ध अभिवृद्धि से अवश्य होता है पर यह शरीर के अंगों में होने वाले परिवर्तनों को विशेष रूप से व्यक्त करता है। उदाहरणार्थ, बालक की हड्डियाँ । आकार में बढ़ती हैं, यह बालक की अभिवृद्धि है, किन्तु हड्डियाँ कड़ी हो जाने के कारण उनके स्वरूप में जो परिवर्तन आ जाता है, यह विकास को दर्शाता है। । इस प्रकार विकास में अभिवृद्धि का भाव निहित रहता है। प्रायः यह भी देखने को मिलता है कि बालक की शारीरिक वृद्धि के अनुपात में उसकी कार्य-कुशलता में प्रगति नहीं होती है। ऐसी स्थिति में यह कहा जाता है कि बालक की वृद्धि तो हो गई है, किन्तु उसका विकास नहीं हुआ है। दरलॉक के विचारों के अनसार, “विकास की प्रक्रिया बालक की गर्भावस्था से लेकर जीवन-पर्यन्त एक क्रम में चलती रहती है तथा प्रत्येक अवस्था का प्रभाव दूसरी अवस्था पर पड़ता है।”

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