बाल केन्द्रित शिक्षा की विशेषताएँ

बाल-केन्द्रित शिक्षा आधुनिक शिक्षा प्रणाली का अभि न अंग है। मनोवैज्ञानिकों ने इसके सन्दर्भ में अनेक विशेषताए बताई हैं, जो इस प्रकार हैं

बालकों को समझना (Understanding children)

  • बालक के सम्बन्ध में शिक्षक को उसके व्यवहार के मूल आधारों, आवश्यकताओं, मानसिक स्तर, रुचियों, योग्यताओं, व्यक्तित्व इत्यादि का विस्तृत ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य ही बालक के व्यवहार को परिमार्जित करना है। अत: शिक्षा बालक की मूल प्रणालियों, प्रेरणाओं और संवेगों पर आधारित होनी चाहिए।
  • बालक जो कुछ सीखता है, उससे उसकी आवश्यकतओं का बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।
  • स्कूल में पिछड़े हुए और समस्याग्रस्त बालकों में से अधिकतर ऐसे होते हैं, जिनकी आवश्यकताएँ स्कूल में पूरी नहीं होती हैं। इसलिए वे स्कूल से भाग जाते हैं, परन्तु बालकों को समझने वाला शिक्षक यह जानता है कि इनके दोषों का मूल कारण उनकी शारीरिक, सामाजिक अथवा मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं में ही कहीं-न-कहीं है। 
  • बाल मनोविज्ञान शिक्षक को बालकों के व्यक्तिगत भेदों से परिचित कराता है और यह बतलाता है कि उनमें रुचि, स्वभाव तथा बुद्धि आदि की दृष्टि से भिन्नता पाई जाती है। अत: कुशल शिक्षक मन्दबुद्धि, सामान्य बुद्धि तथा कुशाग्र बुद्धि बालकों में भेद करके उन्हें उनकी योग्यताओं के अनुसार शिक्षा देता है। शिक्षा देने में शिक्षक को बालक और समाज की आवश्यकताओं के साथ समन्वय करना होता है।

बाल मनोविज्ञान में शिक्षण विधि (Teaching Method in Child Psychology)

शिक्षाशास्त्र शिक्षक को यह बतलाता है कि बालकों को क्या पढ़ाया जाए, परन्तु वास्तविक समस्या यह कि कैसे पढ़ाया जाए? इस समस्या को सुलझाने में बाल मनोविज्ञान शिक्षक की सहायता करता है।

  • बाल मनोविज्ञान सीखने की प्रक्रिया, विधियों, महत्त्वपूर्ण कारकों, लाभदायक और हानिकारक दशाओं, रुकावटों, सीखने का वक्र तथा प्रशिक्षण संक्रमण आदि विभिन्न तत्वों से परिचित कराता है। इनके ज्ञान से शिक्षक बालकों को सिखाने में सहायता कर सकता है।
  • शिक्षा, मनोविज्ञान शिक्षण की विधियों का भी मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करता है और उनमें सुधार के उपाय बतलाता है। बाल-केन्द्रित शिक्षा में शिक्षण विधि को प्रयोग में लाते समय बाल-मनोविज्ञान को ही आधार बनाया जाता है।

विद्यार्थी मूल्यांकन और परीक्षण (Student Evaluation and Testing)

  • शिक्षण से ही शिक्षक की समस्या हल नहीं हो जाती। उसे बालकों के ज्ञान और विकास का मूल्यांकन और परीक्षण भी करना होता है। 
  • मूल्यांकन से परीक्षार्थी की उन्नति का पता चलता है। शिक्षा की प्रक्रिया में शिक्षक और शिक्षार्थी बार-बार यह जानना चाहते हैं कि उन्होंने कितनी प्रगति हासिल की है और यदि उन्हें सफलता अथवा असफलता मिली है, तो क्यों और उसमें क्या परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन सभी प्रश्नों को सुलझाने में मूल्यांकन के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के परीक्षणों और मापों की आवश्यकता पड़ती है।
  • भारतीय शिक्षा प्रणाली में मूल्यांकन शब्द परीक्षा, तनाव और दुश्चिता से जुड़ा हुआ है। वर्तमान बाल-केन्द्रित शिक्षा प्रणाली में सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन पर जोर दिया गया है, जो बालकों के इस प्रकार के तनाव एवं दुश्चिता को दूर करने में सहायक साबित हो रहा है।
  • सतत और व्यापक मूल्यांकन (CCE) का अर्थ छात्रों के विद्यालय आधारित मूल्यांकन की प्रणाली से है, जिसमें छात्रों के विकास के सभी पक्ष शामिल हैं। यह एक बच्चे की विकास प्रक्रिया है, जिसमें दोहरे उद्देश्यों पर बल दिया जाता है। ये उद्देश्य एक ओर मूल्यांकन में निरन्तरता और व्यापक रूप से सीखने के मूल्यांकन पर तथा दूसरी ओर व्यवहार के परिणामों पर आधारित हैं।
  • निरंतरता का अर्थ है मूल्यांकन की नियमितता, अधिगम अन्तरालों का निदान, सुधारात्मक उपायों का उपयोग, स्वयं मूल्यांकन के लिए अध्यापकों और छात्रों के साक्ष्य का फीडबैक अर्थात् प्रतिपुष्टि।
  • व्यापक पद अनेक साधनों और तकनीकों के अनुप्रयोग को सन्दर्भित करता है (परीक्षणकारी और गैर-परीक्षणकारी दोनों) और यह सीखने के क्षेत्रों में छात्रों के विकास के मूल्यांकन पर लक्षित है; जैसे-ज्ञान, समझ, व्याख्या, अनुप्रयोग, विश्लेषण, मूल्यांकन एवं सृजनात्मकता आदि।

बाल केन्द्रित शिक्षा में पाठ्यक्रम का स्वरूप (Nature of curriculum in child centered education)

बालक के सर्वांगीण विकास तथा उसकी शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए एक अच्छे पाठ्यक्रम की आवश्यकता होती है जिसका उद्देश्य बालकों के भविष्य निर्माण पर केन्द्रित होना आवश्यक होता है।

बाल-केन्द्रित शिक्षा के अन्तर्गत पाठ्यक्रम का स्वरूप निम्न प्रकार से होना चाहिए

  • पाठ्यक्रम लचीला होना चाहिए।
  • वातावरण के अनुसार होना चाहिए।
  • पाठ्यक्रम जीवनोपयोगी होना चाहिए।
  • पाठ्यक्रम पूर्व ज्ञान पर आधारित होना चाहिए।
  • क्रियाशीलता के सिद्धान्त के अनुसार होना चाहिए।
  • पाठ्यक्रम छात्रों की रुचि के अनुसार होना चाहिए।
  • पाठ्यक्रम शैक्षिक उद्देश्यों के अनुसार होना चाहिए।
  • पाठ्यक्रम बालकों के मानसिक स्तर के अनुसार होना चाहिए।
  • पाठ्यक्रम समाज की आवश्यकता के अनुसार होना चाहिए।
  • पाठ्यक्रम में व्यक्तिगत विभिन्नताओं का ध्यान रखना चाहिए।
  • पाठ्यक्रम राष्ट्रीय भावनाओं को विकसित करने वाला होना चाहिए।

व्यवस्थापन एवं अनुशासन – Administration and discipline

  • बाल-केन्द्रित शिक्षा के अन्तर्गत कक्षा व विद्यालय में अनुशासन एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाल मनोविज्ञान का सहारा लिया जाता है। उदाहरण के लिए कभी-कभी कुछ शरारती बालकों में अच्छे समायोजक के लक्षण दिखाई देते हैं, ऐसी परिस्थिति में शिक्षकों को उन्हें दबाने के स्थान पर प्रोत्साहित करने के बारे में सोचना पड़ता है।
  • बाल मनोविज्ञान ही शिक्षक को बतलाता है कि एक ही व्यवहार भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रेरणाओं के कारण हो सकता है। शिक्षक को उनके सही प्रेरक कारणों का पता लगाकर उनके अनुकूल व्यवहार करना होता है।
  • कक्षा में अनुशासन बनाए रखने के लिए शिक्षक को रोचक एवं व्यावहारिक शिक्षण शैली को अपनाना चाहिए।

प्रयोग एवं अनुसन्धान – Experiment and research

  • बाल-केन्द्रित शिक्षा में बालकों को प्रयोग एवं अनुसन्धान की ओर उन्मुख करने के लिए भी बाल मनोविज्ञान का सहारा लिया जाता है।
  • नई-नई परिस्थितियों में नई-नई समस्याओं को सुलझाने के लिए शिक्षक को स्वयं प्रयोग करते रहना चाहिए और उससे निकले निष्कर्षों का उपयोग करना चाहिए।
  • मनोविज्ञान के क्षेत्र में होने वाले नए-नए अनुसन्धानों से जो नए-नए तथ्य प्रकाश में आते हैं, उनकी जाँच करने के लिए भी शिक्षक को प्रयोग करने की आवश्यकता है।
  • क्रियात्मक अनुसन्धान स्कूल तथा कक्षा की शैक्षणिक कार्य प्रणाली में सुधार लाने पर बल देता है।

कक्षा में समस्याओं का निदान और निराकरण

बाल-केन्द्रित शिक्षा के अन्तर्गत कक्षा की विभिन्न प्रकार की समस्याओं को पहचानने एवं उनका निराकरण करने के लिए भी बाल मनोविज्ञान का ही सहारा लिया जाता है।

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