बहादुर नाहिर

फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल के अन्तिम दिनों में मेवात के सरदार बहादुर नाहिर ने धर्म-परिवर्तन किया। समय के साथ अपनी काबिलियत के दम पर उसने तुगलक दरबार में बड़ा रुतबा हासिल किया। वह सुलतान ग्यासददीन द्वितीय तथा अबबक्र का खास विश्वासपात्र था। 29 अप्रैल, 1389 को उसने सुलतान अबुबक्र की फिरोजाबाद के युद्ध में निर्णायक सहायता की। सत्ता के संघर्ष में शहजादे नासिरुद्दीन मुहम्मद शाह को सफलता मिली। सिंहासन पर बैठने के बाद बहादुर नाहिर को सलतान नासिरुददीन ने बंदी बना लिया परन्तु, मेवातियों के विरोध के कारण उसे रिहा करना पड़ा। जब उसने कोटला के दर्ग से पनः शाही सेनाओं पर हमले आरंभ कर दिए तो सुलतान ने उस पर हमला कर दिया। बहादुर नाहिर भागकर ‘जहर’ नामक पर्वत पर जा पहुंचा जहाँ उसकी मृत्यु हो गई।

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