पिछड़े बालक

Backward boys

पिछड़े बालक ऐसे बालकों को कहा जाता है, जो अपनी समान उम्र के बालकों से कम उम्र के बालकों के समान शैक्षिक योग्यता रखते हैं। ऐसे बालक मन्द गति से सीखते हैं एवं अपनी एकाग्रता को अधिक समय तक बनाए नहीं रख पाते हैं। पिछड़ेपन के कारणों में मुख्य रूप से शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक होते हैं। विकलांग बालक ऐसे बालक होते हैं, जो मानसिक, शारीरिक एवं संवेगात्मक रूप से दोषयुक्त हों। इन बालकों की समस्याओं का समाधान करके इन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है। कुछ बालकों को पढ़ने, लिखने, मौखिक अभिव्यक्ति तथा अन्य कार्यों में अशक्तता महसूस होती है।

पिछड़े बालकों से तात्पर्य ऐसे बालकों से है, जो अपनी समान उम्र के बालकों से कम उम्र के बालकों के समान शैक्षिक योग्यता रखते हैं या उनसे कम योग्य होते हैं। उदाहरण स्वरूप-आशीष, जो कक्षा-8 का छात्र है तथा उसकी उम्र 16 वर्ष है वहीं 16 वर्ष के छात्र लगभग 10वीं की परीक्षा पास कर चुके होते हैं।

ऐसे में आशीष शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा बालक है। पिछड़े बालक कौन होते हैं? इनसे क्या अभिप्राय है?

इसे और अधिक स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित परिभाषाएँ दी गई हैं

बर्ट के अनुसार, “पिछड़ा हुआ बालक वह है, जो स्कूल के जीवन के मध्य में अपनी आयु स्तर की कक्षा से. एक नीचे की कक्षा का कार्य करने में असमर्थ हो।” बर्टन हाल के अनुसार, “सामान्यत: पिछड़ेपन का प्रयोग उन बालकों के लिए होता है, जिनकी शैक्षणिक उपलब्धि उनकी स्वाभाविक योग्यताओं के स्तर से कम हो।

टी.के.ए. मेनन के अनुसार, “भारतीय परिस्थिति में पिछड़ा बच्चा वो है, जो अपनी कक्षा की औसत आयु से एक वर्ष से अधिक बड़ा हो।”

 शौनल के अनुसार, “पिछड़ा हुआ बालक वह है, जो अपनी आयु के अन्य बालकों की तुलना में अत्यधिक शैक्षणिक दुर्बलता का परिचय देता है।”

पिछड़े बालकों की विशेषताएँ (Characteristics of backward children)

 पिछड़े बालकों की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • पिछड़े हुए बालक मन्द गति से सीखते हैं। इनकी तुलना में सामान्य बालक का अधिगम तीव्र और शीघ्र होता है। इस दोष के कारण बालक सामान्य बालकों के साथ समायोजन नहीं कर पाते।
  • उनके साथ कार्य करने में पिछड़े बालक असुविधा महसूस करते हैं।
  • अपनी आयु के वर्ग के बालकों की तुलना में शैक्षिक क्षेत्र में ये बालक काफी पिछड़े हुए होते हैं। यही कारण है कि ऐसे बालक एक ही कक्षा में कई-कई साल लगा देते हैं।
  • शिक्षा के क्षेत्र में इस दोष को प्रवाह-विहीन (Stagnation) कहा जाता है। इस प्रवाह-विहीनता के पिछड़ेपन के अतिरिक्त और भी बहुत से कारण हो सकते हैं।
  • पिछड़ेपन और बुद्धि लब्धि में सम्बन्ध होना आवश्यक नहीं, क्योंकि पिछड़े हुए बालकों के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहीं भी बुद्धि लब्धि शब्द का प्रयोग नहीं होता, केवल शैक्षणिक लब्धि (EQ) का प्रयोग होता है।
  • पिछड़ेपन में बुद्धि लब्धि का कोई स्तर निश्चित नहीं होता, जिसके आधार पर पिछड़े बालकों का वर्गीकरण किया जा सके।
  • पिछड़े हुए बालकों की शैक्षणिक उपलब्धि उनकी योग्यताओं को देखते हुए बहुत कम प्रतीत होती है। जितना कुछ वह प्राप्त करने की क्षमता रखता है। उतना वह प्राप्त नहीं कर पाता। शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ बालक पूर्णतया असफल रहता है।
  • पिछड़े बालक केवल शिक्षा के क्षेत्र में ही अपनी आयु-वर्ग के बालकों से निम्न कोटि के नहीं होते, बल्कि ऐसे बालक अपनी आयु-वर्ग के बालकों से कम आयु के बालकों के साथ भी कार्य करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं या कठिनाई महसूस करते हैं। इन बालकों की IQ 75-90 के बीच होती है।
  • ऐसे बालकों के लिए विशेष कक्षाओं की व्यवस्था करनी होती है। इन बालकों का ध्यान एवं रुचि थोड़े समय तक ही बनी रहती है।
  • ये बालक अधिक समय तक अपनी एकाग्रता को कायम नहीं रख सकते। ये बालक शैक्षणिक (Academic) तथा सामाजिक कार्य-कलापों में भाग लेने के लिए अपने आप को समर्थ नहीं मानते।
  • किसी समस्या पर सूक्ष्म रूप में (Abstractly) विचार नहीं कर सकते और उस समस्या में उलझ कर रह जाते हैं।

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