1857 के विद्रोह के उपरान्त हरियाणा की देशी रियासतें और उनका स्वतंत्रता संघर्ष

30 दिसंबर, 1803 को मराठा सरदार दौलतराव सिंधिया और अंग्रेजों के बीच सर्जी अंजन गाँव की संधि हुई। इस संधि के उपरान्त हरियाणा और इसके आसपास का क्षेत्र अंग्रेजों के अधिकार में आ गया। अंग्रेजों ने यमुना के दाएँ किनारे के साथ-साथ दिल्ली से 60 किमी. उत्तर तथा 60 किमी. दक्षिण के क्षेत्र में पानीपत, सोनीपत, समालखा, गन्नौर, पलवल, नूंह, नगीना, हथीन, भोड़ा, टपूकड़ा, फिरोजपुर-झिरका, सोहना तथा रेवाडी के परगने ‘असाइंड टेरिटरी’ के रूप में अपने अधिकार में रख लिए। शेष क्षेत्र अपने वफादार राजा-नवाबों के पास जागीरों के रूप में रहने दिया।

परन्तु, अंग्रेजों की भूख लगातार बढ़ती जा रही थी। 1818 ई. से 1851 ई. के बीच अंग्रेजों ने विभिन्न बहाने बनाकर रानिया, छछरौली, अंबाला, रादौर, दयालगढ़, कैथल, बुफोल, चलौंडी आदि रियासतें हड़प लीं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के उपरान्त क्रान्ति में भाग लेने के कारण अंग्रेजों ने झज्जर, बल्लभगढ़, फर्रुखनगर, दादरी आदि रियासतों को उनके तत्कालीन शासकों से छीन लिया। अंग्रेजों ने नाभा के राजा को झज्जर रियासत के कांटी तथा बावल के परगने दे दिए। पटियाला के राजा को झज्जर रियासत का नारनौल के आसपास का एक बहुत बड़ा क्षेत्र बख्शीश के रूप में मिल गया। दादरी की पूरी रियासत जीन्द के राजा सरूप सिंह को क्रान्ति में अंग्रेजों की सहायता हेतु पुरस्कार के रूप में मिल गई।

इस प्रकार 1857 की क्रांति के उपरान्त हरियाणा में जीन्द, दुजाना, पटौदी, लोहारू रियासत, पटियाला रियासत का नारनौल का क्षेत्र और नाभा रियासत का बावल तथा कांटी का क्षेत्र देशी राजाओं के अधिकार में बचे थे। ये रियासतें 1947 ई. तक बनी रही तथा आजादी के उपरान्त इनका पंजाब में विलय हो गया।

1857 की क्रांति के उपरांत हरियाणा में मुख्य रियासतें इस प्रकार से थी:

पटियाला रियासत का नारनौल का क्षेत्र

1857 का क्रान्ति में जीन्द, पटियाला तथा नाभा रियासतों के सिख शासकों ने क्रान्ति को दबाने के लिए तन-मन-धन से अंग्रेजों की सहायता की था। क्रान्ति को दबाने के उपरान्त अंग्रेजों ने वर्तमान महेन्द्रगढ़ जिले का नारनौल का क्षेत्र ईनाम-स्वरूप पटियाला रियासत के शासका को दिया। अन्य देसी रजवाड़ों की तरह पटियाला के सिख शासकों ने जनहित के कार्यों के ऊपर अपनी विलासिता को तरजीह दी। अपन
काआ को खुश करने के लिए जनता पर भारी कर थोप दिए। नारनौल की जनता शासकों से आजिज आ चुकी थी। जन समस्याआ 17 क लिए सन् 1945 में लोगों ने नारनौल में प्रजामण्डल की स्थापना की। प्रजामण्डल के नेताओं में राव माधोसिह, रामा
” स्थापना की। प्रजामण्डल के नेताओं में राव माधोसिंह, रामकिशोर, मातादीन, चा. दुलाचद, रामशरणचंद मित्तल तथा श्रीराम कौशिक आदि प्रमुख थे। महाराजा पटियाला ने सख्ती से काम लिया।
अयोध्याप्रसाद, कमला देवी, चौ. दुलीचंद, रामशरणचद मित्तल
प्रजामण्डल आदालन का दबाने के लिए पटियाला के शासकों ने पुरा जोर लगाया परन्त लोगों के उत्साह को दबा नहीं पाए। अंतत: देश आजाद हो गया तथा पटियाला रियासत का भारतीय गणराज्य में विलय हो गया।

नाभा रियासत का बावल, कनीना तथा अटेली का क्षेत्र

1857 का क्रान्ति के उपरान्त अग्रेजों ने क्रान्ति को दबाने के लिए सहायता के बदले वर्तमान रेवाडी जिले का बावल का क्षेत्र तथा महेन्द्रगढ़ जिल का कनाना आर अटली का क्षेत्र नाभा रियासत के सिख शासकों को बख्शीश के रूप में दे दिया। बाकी रियासतों की भांति नाभा रियासत के हालात भा अच्छ नहा था नाभा के सिख शासक महाराज प्रतापसिंह ने जनता पर भारी कर लगाए तथा अपनी विलासिता की जरूरतों को पूरा करन क लिए बगार ललकर जनता की कमर तोड दी। 1946 ई. में इस क्षेत्र में भी सशक्त प्रजामण्डल आंदोलन चला। आंदोलन को कचलने के लिए महाराज प्रतापसिह ने आंदोलनकारियों पर खुब अत्याचार किए। आंदोलनकारियों ने इस क्षेत्र में ‘नाभा वाले इलाका छोड़ो’ आंदोलन छड़ दिया। महाराजा नाभा ने विवश होकर आन्दोलनकारियों से समझौता कर लिया तथा आंदोलन के नेताओं को रिहा कर दिया। देश की आजादी के उपरान्त 1948 ई. में नाभा रियासत का भारतीय गणराज्य में विलय हो गया।

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