हड़प्पा सभ्यता की आर्थिक स्थिति

कृषि-

सिंधु तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा प्रति वर्ष लायी गयी उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी कृषि हेतु महत्वपूर्ण मानी जाती थी। इन उपजाऊ मैदानों में मुख्य रूप से गेहूँ और जौ की खेती की जाती थी, सिंधु घाटी की यही मुख्य फसल भी थी। अभी तक 9 फसलें पहचानी गयी हैं। चावल (केवल गुजरात (लोथल) में और संभवत: राजस्थान में भी), जौ की दो किस्में, गेहूँ की तीन किस्में, कपास, खजूर, तरबूज, मटर और एक ऐसी किस्म जिसे ‘ब्रासिका जंसी’ की संज्ञा दी गयी है। इसके अतिरिक्त मटर, सरसों, तिल एवं कपास की भी खेती होती थी। लोथल में हुई खुदाई में धान तथा बाजरे की खेती के अवशेष मिले हैं।

इस समय खेती के कार्यों में प्रस्तर एवं कांस्य धातु के बने औजार प्रयुक्त होते थे। कालीबंगा में प्राक-सैधंव अवस्था के एक हल से जुते हुए खेत का साक्ष्य मिला है। बनवाली में मिट्टी का बना हुआ एक हल का खिलौना मिला है। ऐसा प्रतीत होता है कि हड़प्पा के लोग लकड़ी के हल का प्रयोग करते थे। सम्भवतः हड़प्पा सभ्यता के लोग ही सर्वप्रथम कपास उगाना प्रारम्भ किये। इसीलिए यूनानी लोगों ने इस प्रदेश को ‘सिंडोन’ कहा। लोथल से आटा पीसने की पत्थर की चक्की के दो पाट मिले हैं। पेड़-पौधों में पीपल, खजूर, नीम, नीबू एवं केला उगाने के साक्ष्य मिले है।

पशुपालन

मुख्य पालतु पशुओं में डीलदार एवं बिना डील वाले बैल, भैंस, गाय, भेड़-बकरी, कुत्ते, गधे, खच्चर और सुअर आदि है। हाथी और घोड़े पालने के साक्ष्य प्रमाणित नहीं हो सके हैं। लोथल एवं रंगपुर से घोड़े की मृण्मूर्तियों के अवशेष मिले हैं। सुरकोतड़ा से सैन्धव कालीन घोड़े के अस्थिपंजर के अवशेष मिले हैं। कुछ पशु-पक्षियों जैसे बन्दर, खरगोश, हिरन, मुर्गा, मोर, तोता, उल्लू के अवशेष खिलौनों और मूर्तियों के रूप में मिले हैं।

शिल्प एवं उद्योग धन्धे 

इस समय तांबे में टिन मिलाकर कांसा तैयार किया जाता था। तांबा  राजस्थान के खेतड़ी से, टिन अफगानिस्तान से मंगाया जाता था। सम्भवतः कसेरों (कांस्य शिल्पियों) का समाज में महत्वपूर्ण स्थान था। कसेरों के अतिरिक्त राजगीरों एवं आभूषण निर्माताओं का समुदाय भी सक्रिय था। सैंधव सभ्यता में सूती वस्त्र का उल्लेख मिलता है। मोहनजोदड़ों से मजीठा रंग से लाल रंग में रंगे हुये चांदी के बर्तन में पाये गये थे। ताँबे के दो उपकरणों में लिपटा हुआ सूती कपड़ा एवं सूती धागे भी मोहनजोदड़ों से प्राप्त हुये थे। मोहनजोदड़ो से बने हुए सूती कपड़े का एक टुकड़ा मिला है। कालीवंगा से मिले मिट्टी के बर्तन के एक टुकड़े पर सूती कपड़े की छाप मिली है। कालीबंगा से ही सूती वस्त्रों में लिपटा हुआ एक उस्तरा भी मिला है। लोथल से प्राप्त मुद्रांक (Scalings) पर सूती वस्त्रों की छाप मिली है। आलमगीरपुर से प्राप्त मिट्टी की एक नाँद पर बुने हुए वस्त्र के निशान मिले हैं। मोहनजोदड़ों से प्रात पुरोहित की प्रस्तर मूर्तियों तिपातिया अलंकरण युक्त शाल ओढ़े हुए है। इससे स्पष्ट होता है कि सिन्धु सभ्यता में वस्त्रों पर कढ़ाई का काम भी होता था। इन साक्ष्यों के आधार पर ऐसा लगता है कि इस समय सूती वस्त्र एवं बुनाई उद्योग काफी विकसित था। कताई में प्रयोग होने वाली तकलियों के भी प्रमाण मिले हैं। इस समय के महत्वपूर्ण शिल्पों में मुद्रा निर्माण एवं मूर्ति का निर्माण सम्मिलित है। इस सभ्यता के लोगों द्वारा नाव बनाने के भी साक्ष्य मिले हैं। इस समय बनने वाले सोने, चांदी के आभूषणों के लिए सोना, चांदी सम्भवतः अफगानिस्तान से एवं रत्न दक्षिण भारत से मंगाया जाता था। इस समय कुम्हार के चाक से निर्मित मृद्भाण्ड काफी प्रचलित थे, जिन पर गाढ़ी लाल चिकनी मिट्टी पर काले रंग के ज्यामितीय एवं प्रकृति से जुड़े डिजाइन बनाये गये थे। धातुओं में सोना, चाँदी, ताँबा, कासा तथा सीसा का उन्हें ज्ञान था। इन धातुओं से विभिन्न प्रकार के आभूषण एवं उपकरण बनाए जाते थे। खुदाई में ताँबे-काँसे के उपकरण अधिक मात्रा में मिले है। चन्हूदड़ों तथा लोथल में मनके बनाने का कार्य होता था। चन्हुदड़ों में सेलखड़ी मुहरे तथा चर्ट के वटखरे भी तैयार किए जाते थे। बालाकोट तथा लोथल में सीप उद्योग अपने विकसित अवस्था में था।

व्यापार एवं वाणिज्य–

हड़प्पाई लोग सिन्धु सभ्यता क्षेत्र के भीतर पत्थर, धातु शल्क आदि का व्यापार करते थे। लेकिन वे जो वस्तुएं बनाते थे उसके लिए अपेक्षित कच्चा माल उनके नगरों में उपलब्ध नहीं था। अत: उन्हें बाह्य देशों से व्यापारिक सम्पर्क स्थापित करना पड़ा। तैयार माल की खपत अपने क्षेत्रों में नहीं हो पाती थी अत: उन वस्तुओं का निर्यात बाह्य देशों को करना पड़ा। इस प्रकार कच्चे माल की आवश्यकता और तैयार माल की खपत की आवश्यकता ने व्यापारिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाया। व्यापार में धातु के सिक्कों का प्रयोग नहीं करते थे वरन् वस्तु विनिमय प्रणाली पर ही उनके व्यापार आधारित थे। व्यापारिक वस्तुओं की गाँठों पर शिल्पियों एवं व्यापारियों द्वारा अपनी मुहर की छाप थी तथा दुसरी ओर भेजे जाने वाले का निशान अंकित था। बाट-माप एवं नापतोल का व्यापारिक कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान है। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, लोथल एवं कालीबंगा में प्रयुक्त बाटों की तौल का अनुपात 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 160, 200, 320 आदि था। बाट धनाकार, वर्तुलाकार, बेलनाकार, शंक्वाकार एवं ढोलाकार थे। तौल की इकाई संभवत: 16 के अनुपात में थी। मोहनजोदड़ो से सीप का तथा लोथल से हाथी दांत से निर्मित एक-एक पैमाना (Scale) मिला है।

सैंधव सभ्यता के लोग यातायात के रूप में दो पहियों एवं 4 पहियों वाली बैलगाड़ी अथवा भैंसागाड़ी का उपयोग करते थे। उनकी वैलगाड़ी में प्रयुक्त पहिये ठोस आकार के होते थे। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पर अंकित नाव का चित्र एवं लोथल से मिली मिट्टी की खिलौना नाव से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस सभ्यता के लोग आन्तरिक एवं बाह्य व्यापार में मस्तूल वाली नावों का उपयोग करते थे। हड़प्पा सभ्यता के लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध राजस्थान, अफगानिस्तान, ईरान एवं मध्य एशिया के साथ था। हड़प्पावासियों ने लाजवर्द मणि (Lapis Lazuli) का व्यापार सुदूर देशों से किया था। उद्योग धन्धों एवं शिल्प कार्यों के लिए कच्चा माल गुजरात, सिन्धु, राजस्थान, दक्षिणी भारत, बलूचिस्तान आदि क्षेत्रों से मँगाया जाता था। इसके अतिरिक्त अफगानिस्तान, सोवियत तुर्कमानिया तथा मेसोपाठामिया आदि से भी कच्चा माल मँगाया जाता था। मनके बनाने के लिए गोमेद गुजरात से मँगाया जाता था। फ्लिण्ट तथा चर्ट के प्रस्तर-खण्ड पाकिस्तान के सिन्ध-क्षेत्र में स्थित रोड़ी तथा भरुखर की खदानों से मँगाया जाता था। ताँबा राजस्थान के झुनझुन जिले में स्थित खेतड़ी की खानों से मँगाया जाता था। सोना कर्नाटक के कोलार की खानों से मिलता था।

लाजवर्द एवं चाँदी अफगानिस्तान से आयात की जाती थी। अफगानिस्तान का बदक्शाँ क्षेत्र लाजवर्द के लिए प्रसिद्ध था। अफगानिस्तान में स्थित शोर्तगोई नामक स्थान तक सिन्धु सभ्यता का प्रसार मिलता है। इसके अतिरिक्त अन्यथा नहीं मिलता है, इसलिए शोर्तगोई दो मध्यवर्ती व्यापारिक बस्ती माना जा सकता है। ईरान से संगयशव, अथवा हरिताश्म, फीरोजा, टिन तथा चाँदी आयात की जाती थी। सिन्धु से मेसोपोटामियाँ को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में सूती वस्त्र, ईमारती लकड़ी, मशाले, हाथीदाँत एवं पशु-पक्षी रहे होंगे। उर, किश, लगश, निप्पुर, टेल अस्मार, टेपे, गावरा, हमा, आदि मेसोपोटामियाँ सभ्यता के नगरों से सिन्धु सभ्यता की लगभग एक दर्जन मुहरे मिली है। मेसोपाटामियाँ से सिन्धु सभ्यता के नगरों द्वारा आयात की जाने वाली वस्तुओं में मोहनजोदड़ों से प्राप्त हरितास रंग का क्लोराइट प्रस्तर का टुकड़ा जिस पर चटाई की तरह डिजाइन बनी है उल्लेखनीय है।

मेसोपाटामिया और सिन्धु सभ्यता के बीच व्यापारिक सम्बन्धों के विषय में अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर यह ज्ञात होता है कि दिलमुन से सोना, चाँदी, ताँबा, हाथीदाँत, हाथीदाँत की कंघी, लाजवर्द, माणिक्य के मनके, इमारती लकड़ी और मोती का आयात किया जाता था। मगन से ताँबा मँगाया जाता था। मेलुहा से मेसोपोटामिया के नगरों द्वारा आवनुस, इमारती लकड़ी, ताँबा, सोना, चाँदी, लाजवर्द, माणिक्य के मनके, हाथीदाँत की कंघी, पशु-पक्षी, आभूषण आदि आयात किया जाता था। मेसोपोटामिया में प्राप्त सिंधु सभ्यता से सम्बन्धित अभिलेखों एवं मुहरों पर ‘मेलुहा’ का जिक्र मिलता है। मेलुहा सिंध क्षेत्र का ही प्राचीन भाग है। दिलमुन एवं मकन व्यापारिक केन्द्र मेलुहा एवं मेसोपोटामिया के बीच स्थित थे। मेसोपोटामिया में प्रवेश हेतु ‘उर’ एक महत्वपूर्ण बन्दरगाह था। दिलमुन की पहचान फारस की खाड़ी के बहरीन द्वीप से की जाती है। दिलमुन सैंधव व्यापारिक केन्द्रों तथा मेसोपाटामिया के साथ व्यापार का मध्यस्थ बंदरगाह था। भारत में लोथल से फारस की मुहरें प्राप्त हुई हैं। उन्होंने उत्तरी अफगानिस्तान में एक वाणिज्य उपनिवेश स्थापित किया था जिसके सहारे उनका व्यापार मध्य एशिया के साथ चलता था।

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