हरियाणा प्रदेश के लोक वाद्य यंत्र

हरियाणा में लोकसंगीत की परंपरा बड़ी समृद्ध रही हैं वाद्य यंत्रों का प्रयोग केवल नृत्य और गायन में ही नहीं होता बल्कि धार्मिक, पारिवारिक तथा सामाजिक अनुष्ठानों में भी वाद्ययंत्रों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। मन्दिरों में पूजा पद्धति के समय शंख, मदंग, घंटा. वीणा, घड़ियाल, खड़ताल, मंजीरा आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग होता है। पारिवारिक उत्सवों तथा अनुष्ठानों में खडताल, ढफली आदि का प्रयोग सामान्य है।

वादन की दृष्टि से लोकवाद्यों की चार श्रेणियाँ हैं

  • तत् वाद्य            जिन लोक वाद्य यंत्रों में तंतु अर्थात् तार या तांत का प्रयोग होता है, ऐसे वाद्यों को ‘तत वाद्य’ कहा जाता है। तत वाद्य यंत्रों                             मे  एकतारा, दुतारा, सारंगी तथा तंबूरा आदि प्रमुख हैं।
  • सुबिर वाद्य         ये ऐसे वाद्य यंत्र हैं जो मुँह से फूंक मारकर बजाए जाते हैं। हरियाणा के ऐसे लोकवाद्यों में अलगोजा, शहनाई, बांसरी,                                शंख  आदि प्रमुख हैं।
  • अवनद्ध वाद्य      ये ऐसे वाद्य यंत्र हैं जो चमड़े से मढे ( ढके) होते हैं। इन वाद्य यंत्रों में मृदंग, तबला, डफ, दोलक दम खंजरी                                              नगाड़ा आदि वाद्य यंत्र प्रमुख हैं।
  • घन वाद्य             ये ऐसे वाद्य यंत्र हैं जो चोट या आघात से बजाए जाते हैं। इन लोक वाद्यों में झांझ, मंजीरा, करताल तथा घंटा आदि                                    प्रमुख हैं।

तत्वाद्य यंत्र

सारंगी

यह वाद्य यंत्र सागवान, कैर या रोहिड़ा की लकड़ी से बनाया जाता है। इसमें बकरे की आंत के तार लगे होते हैं। सारंगी को गज की सहायता से बजाया जाता है। कमान रूपी लकड़ी के टुकड़े पर घोड़े के बाल बांधकर गज का निर्माण किया जाता है। गज जब आंत के तारों पर रगड़ खाती है तो मधुर स्वर उत्पन्न होते हैं। सारंगी पर समस्वरण के लिए चार खूटे लगाए जाते हैं। इन खंटों से तारों को लगाया जाता है ताकि 12 अर्द्ध स्वरकों के तारतत्त्व के अनुसार इन्हें समायोजित किया जा सके। सारंगी के अनेक भेद होते हैं।  पानीपत घराने के उस्ताद मामन खां को हरियाणा के सर्वश्रेष्ठ सारंगी वादक का सम्मान प्राप्त था। 

 तूंबा

यह वाद्य यत्र कटे हुए तूंबे पर चमडा मढकर बनाया जाता है। चमडे में छेद करके उसमें पशु की आंत का तार डालकर तार के दूसरे छोर पर लकड़ी का टुकड़ा बाँध दिया जाता है। वादक तंबे को काँख में दबाकर एक हाथ से तार को खींच कर दूसरे हाथ से लकड़ी पर प्रहार करता है।

इकतारा

यह लोकवाद्य बांस के टुकड़े को तंबी के साथ जोडकर बनाया जाता है। इस बांस के टुकड़े पर एक तार खिंचा होता है। इसीलिए इसे इकतारा. कहा जाता है। सामान्यतः भजन-कीर्तन करने वाले श्रद्धाल इस वाद्य यंत्र का प्रयोग करते हैं। इस वाद्य यत्र का एक हाथ में पकड़कर उसी हाथ की उंगली से बजाया जाता है। प्राचीन काल में एकतारे का प्रयोग भाटों व चारणों द्वारा किया जाता था।

दोतारा

यह इकतारे जैसा ही यंत्र होता है। इसमें एक के स्थान पर दो तार बंधे होते हैं।

बैंजो

यह वाद्य यंत्र मलतः पाश्चात्य संस्कति से आयातित है। इस वाद्य यंत्र के बाईं ओर हारमोनियम की तरह स्वर हात हा स्वर नीचे लगे बारीक तारों को दाहिने हाथ अथवा प्लास्टिक या ब्लेड के टुकड़े से बजाया जाता है।

हारमोनियम

यह वाद्य यंत्र भी मूलतः भारत से संबंधित नहीं है। हारमोनियम में भी बैंजों की तरह स्वर लगे होते हैं तथा इसे सामान्यतः . भजन और सांग में प्रयोग किया जाता है। यह स्वर प्रधान वाद्य है।

सुषिर वाद्य यंत्र

बासुरी

यह वाद्य यंत्र बांस के टुकड़े से बना होता है। दोनों तरफ से खुले इस वाद्य यंत्र में सात छिद्र होते हैं। इसे ‘मुरली’ भी कहा जाता है। भगवान श्री कृष्ण का प्रिय वाद्य यंत्र बांसुरी ऐतिहासिक सुषिर वाद्य है।

अलगोजा

यह वाद्य यंत्र हरियाणवी लोक संगीत में विशेष स्थान रखता है। लकड़ी या बांस से निर्मित यह सुषिर वाद्य सामान्यतः बांसुरी जैसा होता है। चरवाहे पशु चराते समय आमतौर पर इसका प्रयोग करते हैं।

 बीन

बांसुरी की भाँति बीन भी सुषिर वाद्य यंत्र है। बीन का निर्माण एक विशेष प्रकार के तुंबे से होता है। इसका ऊपरी भाग लंबा – तथा नीचे का भाग गोल होता है। तुंबे के नीचे के भाग में स्वरों के छेद वाली दो नलियाँ लगाई जाती हैं। एक नली से स्वर भरता है तो दूसरी नली से स्वर निकाला जाता है।

शहनाई

यह वाद्ययंत्र पारंपरिक रूप से हरियाणा का वाद्य यंत्र नहीं है परन्तु, हरियाणवी संगीत में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इस वाद्य यंत्र को मुख्यतः विवाह आदि के अवसर पर बजाया जाता है।

शंख

यह वाद्य यंत्र मानव को ज्ञात सबसे प्राचीन सुषिर वाद्य यंत्र है। समुद्र से प्राकृतिक रूप से मिलने वाले इस वाद्य यंत्र का प्रयोग विभिन्न प्रकार के शुभ कार्यों के लिए किया जाता है। उपयोग में लाने से पूर्व इसके आधार में छेद किया जाता है। इस वाद्य को पाय. मन्दिरों तथा तीर्थ स्थलों पर उपयोग में लाया जाता है। महाभारत में प्रतिदिन युद्ध का आरंभ तथा समापन शंखनाद से ही होता था।

महाभारत में श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा युधिष्ठिर के शंखों के नाम थे

श्रीकृष्ण का शंख : पांचजन्य। 

अर्जुन का शंख : देवदत्त।

युधिष्ठिर का शंख : उन्नत विजय।

शंख मख्यतः दो प्रकार के होते हैं      दक्षिणावर्ती तथा वामावर्ती।

दक्षिणावर्ती शंख धार्मिक आयोजनों के लिए शभ हैं तथा दर्लभ भी।

अवनद्ध वाद्य

ताशा

मिटटी तांबा या लोहे के गोलागार कुण्डों पर बकरे की पतली खाल मढ़कर यह वाद्य बनाया जाता है। इस मगलकालीन वाद्य यंत्र को गले में लटकाकर बांस की खपच्चियों से बजाया जाता है।

डेरू

डमरू जैसी आकति का यह वाद्य यंत्र वास्तव में डमरू का ही बड़ा रूप है। डेरू आम की लकडी से बना होता है जिसके दोनों ओर चमडा चढा होता है। बीच में बंधी रस्सी से इस चमड़ को आवश्यकतानुसार खींचा जा सकता है। सामान्यत: रतजगा तथा गूगा-पीर के जागरण में इसका प्रयोग होता है।

डमरू

यह वाद्य यंत्र भगवान शिव का प्रतीक है। यह डरू का छोटा रूप है। मान्यता है कि भगवान शिव ने तांडव नृत्य के दौरान डमरू बजाया था। जादुगर तथा मदारियों द्वारा भी खेल दिखाते समय डमरू का प्रयोग किया जाता है।

 डफ

इस वाद्य यंत्र का प्रयोग मख्य रूप से डफ तथा धमाल नृत्य म हाता है। वृत्ताकार ड्रम के एक ओर चढी खाल वाला यह वादा

यत्र दूसरी ओर से खुला होता है। इस पर हाथ से थाप दी जाती है।

डफली

हरियाणा का यह लोक वाद्य डफ का लघु रूप है। इसके एक गोल फ्रेम के एक ओर चमड़ा चढ़ा होता है। फ्रेम के, बीच-बीच में घुघरू पिरोए जाते हैं।

नगाड़ा

नगाड़े को तबले का वृहद रूप कहा जा सकता है। इसे भी तबले की भांति जमीन पर रखकर बजाया जाता है। लोहे के बड़े कटोरे के आकार वाले खोल पर बकरे या भैंसे की खाल चढ़ी होती है। नगाड़े के वादन के लिए लकड़ी की डंडी का प्रयोग किया जाता है जिसे ‘चोब’ कहा जाता है। आकार के अनुसार नगाड़ा दो प्रकार का होता है-बड़ा नगाड़ा तथा छोटा नगाड़ा। छोटे नगाड़े के साथ एक नगाड़ी भी होती है जिसे ‘झिल‘ भी कहा जाता है। प्राचीनकाल में किसी भी प्रकार की उद्घोषणा से पूर्व नगाड़ा बजाया जाता था।

ढोलक

ढोलक हरियाणवी संस्कृति का महत्त्वपूर्ण अंग है। ढोलक का निर्माण सामान्यतः आम, शीशम, सागवान या जामुन की लकड़ी से होता है। लकड़ी के खोल पर दोनों सिरों पर जानवरों की खाल चढ़ाई जाती है जिसे लोहे के घेरे की सहायता से कस दिया जाता है। इसे दोनों हाथों से बजाया जाता है। ढोलक को बजाने के लिए डंडी का प्रयोग किया जाता है। विवाहोत्सव, घुड़चढ़ी, कबड्डी-कुश्ती के दंगल में ढोलक का खूब प्रयोग होता है। ढोलक पंजाबी भंगड़ा की भी जान होता है। इसके लघु रूप ढोलकी का प्रयोग विवाहोत्सव में महिला संगीत तथा भजन कीर्तन के दौरान किया जाता है।

नौबत

यह वाद्य यंत्र धातु की गहरी अण्डाकार कुंडी के आकार का होता है। धातु के खोल पर भैंसे की खाल मढ़कर उसे चमड़े की डोरियों से कस दिया जाता है। ‘नौबत’ का प्रयोग मन्दिर तथा जगरातों में किया जाता है।

खंजरी

यह परंपरागत रूप से जोगियों का वाद्य यंत्र होता है। लकड़ी के घेरे में पीतल की गोलाकार पत्तियाँ लगी होती हैं। इसे हाथ की चोट से बजाया जाता है। लकड़ी की खोल पर जानवरों की खाल चढ़ी होती है।

घड़वा

यह हरियाणा का परंपरागत वाद्य यंत्र है। यह बेहद सस्ता तथा सहज-सुलभ वाद्य है। मिट्टी के घड़े के मुँह पर वाहनों के – टायर की ट्यूब का रबड़ बाँधकर उसे रबड़ के छल्ले से कस दिया जाता है। घड़वे के वादन के लिए बाएँ हाथ की थाप तथा दाएँ से पट्टे का प्रहार किया जाता है। घड़वे के प्रयोग के बिना रागणी तथा सांग की कल्पना तक नहीं की जा सकती।

घन वाद्य

ये ऐसे वाद्य यंत्र हैं जो चोट या आघात से बजाए जाते हैं।

प्रमुख घन वाद्य यंत्रों को यहाँ सूचीबद्ध किया गया है।

मंजीरा

मंजीरा झांझ का लघु रूप है जो पीतल, जस्ते एवं तांबे के मिश्रण से बनाया जाता है। झांझ पीतल के दो बड़े चक्राकार आकृति के यंत्र होते हैं। इनमें डोरी पिरोई होती है। डोरी की सहायता से दोनों हाथों से इन्हें टकराकर बजाया जाता है। आठ से 16 अंगुल व्यास के धातु के गोल टुकड़े झांझ कहलाते हैं। भक्ति और लोक संगीत में मंजीरे का उपयोग झांझ की भांति किया जाता है।

खड़ताल

खड़ताल बनाने के लिए आम के वृक्ष की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। इसमें लकड़ी की चार पट्टिकाओं का प्रयोग किया जाता है। लकड़ी के साथ घुघरू लगाए जाते हैं।

चिमटा

संगीत में प्रयोग होने वाले चिमटे की आकृति रसोई में प्रयोग होने वाले चिमटे जैसी होती है। परन्तु, संगीत के लिए प्रयोग होने वाले चिमटे का आकार बड़ा होता है। चिमटे में एक गज की लंबाई के लोहे के दो चकोर टुकड़े होते हैं जिन्हें एक ओर से जोड़ा जाता है। संगीत की लय देने के लिए छोटी-छोटी घंटियां लगाई जाती हैं।

धुंघरू

नर्तक/नर्तकियों द्वारा नृत्य के दौरान अपने टखनों पर धुंघरू बाँधे जाते हैं। घुघरू नृत्य के दौरान लय उत्पन्न करने में सहायक होते हैं।

 

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