हड़प्पा सभ्यता के नगरों की विशेषताएं

हड़प्पा संस्कृति की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता थी—इसकी नगर- योजना प्रणाली। इस सभ्यता के महत्वपूर्ण स्थलों के नगर निर्माण में समरूपता थी। नगरों के भवनों के बारे में विशिष्ट बात यह थी कि ये जाल की तरह विन्यस्त थे।

नगर–

प्राप्त नगरों के अवशेषों से पूर्व और पश्चिम दिशा में दो टीले मिले हैं। पूर्व दिशा में स्थित टीले पर नगर या फिर आवास क्षेत्र के साक्ष्य मिलते हैं। पश्चिम के टीले पर गढ़ी अथवा दुर्ग (Citadel) के साक्ष्य मिले हैं। लोथल एवं सुरकोतड़ा के दुर्ग और नगर क्षेत्र दोनों एक ही रक्षा-प्राचीर से घिरे हैं।

मकान

 यहाँ प्राप्त मकानों के अवशेषों से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक मकान के बीच में एक आंगन होता था, आंगन के चारों ओर चार-पाँच कमरे रसोईघर एवं स्नानागार के साथ बने होते थे। स्नानागार गली की ओर बने होते थे। कुछ बड़े आकार के भवन मिले हैं जिसमें 30 कमरे तक बने होते थे एवं दो मंजिले भवन का भी अवशेष मिला है। घरों के दरवाजे एवं खिड़कियां सड़क की ओर न खुलकर पिछवाड़े की ओर खुलती थीं। भवन निर्माण में प्रयुक्त ईंटों का आकार 51.43×26,27×6.35 से0 मी0 बड़ी ईंटें, 36.83×18.41×10.16 से0 मी0 मझोले आकार की ईंटें, 24.13×11.05×5.08 से0 मी0 छोटे आकार की ईंटें होती थीं। ईंटों के निर्माण का निश्चित अनुपात 4 : 2 : 1 था। यहाँ पर मिले भवन अलंकरण रहित हैं, केवल कालीबंगा में फर्श के निर्माण में अलंकृत ईंट का प्रयोग किया गया है।

सड़के-

सिंधु सभ्यता में सड़कों का जाल नगर को कई भागों में विभाजित करता था। सड़कें पूर्व से पश्चिम एवं उत्तर से दक्षिण की ओर जाती हुई एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं। मोहन जोदड़ो में पाये गये मुख्य मार्गों की चौड़ाई लगभग 9.15 मीटर एवं गलियां करीब 3 मीटर चौड़ी होती थीं। सड़कों का निर्माण मिट्टी से किया गया था। सड़कों के दोनों ओर नालियों का निर्माण पक्की ईंटों द्वारा किया गया था और इन नालियों में थोड़ी-थोड़ी दूर पर ‘मानुस मोखे’ बनाये गये थे। नालियों के जल निकास का इतना उत्तम प्रबन्ध किसी अन्य समकालीन सभ्यता में नहीं मिलता।

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