सैंधव-सभ्यता का विनाश

_सैंधव-सभ्यता के पतन के संदर्भ में ह्वीलर का मत पूरी तरह अमान्य हो चुका है। हरियूपिया का उल्लेख जो ऋग्वेद में प्राप्त है उसे ह्वीलर ने हड़प्पा मान लिया और किले को पूर और आर्यों के देवता इंद्र को पुरंदर (किले को नष्ट करने वाला) मानकर यह सिद्धांत प्रतिपादित कर दिया कि सैंधव नगरों का पतन आर्यों के आक्रमण के कारण हुआ था। ध्यातव्य है कि व्हीलर का यह सिद्धांत तभी खंडित हो जाता है जब सिंधु-सभ्यता को नगरीय सभ्यता घोषित किया जाता है। मोहनजोदड़ों से प्राप्त नरकंकाल किसी एक ही समय के नहीं हैं जिनसे व्यापक नरसंहार द्योतित हो रहा हो।

सैन्धव सभ्यता के विनाश से संबंधित इतिहासकारो के मत

 इस सभ्यता के विघटन से जुड़े हुए अनेक इतिहासकारों के मत इस प्रकार हैं

  • “प्रशासनिक शिथिलता के कारण इस सभ्यता का विनाश हुआ।” जॉन मार्शल 
  • “जलवायु में हुए परिवर्तन के कारण यह सभ्यता नष्ट हुई।”-ऑरेल
  • “सिंधु सभ्यता बाढ़ के कारण नष्ट हुई।”-अर्नेस्ट मैके एवं जॉन मार्शल
  • “भू-तात्विक परिवर्तन के कारण यह सभ्यता नष्ट हुई।”-एम0 आर0 साहनी, राइक्स एवं डेल्स 
  • “मोहनजोदड़ो के लोगों की आग लगाकर हत्या कर दी गयी।”- डी0 डी0/ कौशाम्बी 
  • “सैन्धव सभ्यता विदेशी आक्रमण व आर्यों के आक्रमण से नष्ट हुई।” गार्डन चाइल्ड एवं ह्वीलर

सैंधव नगरों के पतन के संदर्भ में अन्य मत जो इतिहासकारों द्वारा दिये गये हैं उन्हें पूर्णरूपेण सत्य न मानकर आंशिक सत्य मानना ही उचित है, क्योंकि सैंधव सभ्यता जो इतने विस्तृत क्षेत्र में फैली थी उसका पतन आकास्मिक रूप से किसी एक कारण से हआ हो, यह मत आपत्तिजनक प्रतीत होता है। सभी स्थलों के पतन के कारण-अलग अलग थे। किसी स्थल का पतन बाढ़ के कारण हुआ तो किसी स्थल का पतन अग्निकांड के कारण जबकि किसी स्थल का पतन जलवायु परिवर्तन या विवर्तनिक विक्षोभ के कारण हुआ। इन स्थलों का पतन आकस्मिक न होकर क्रमिक था। ऐसी स्थिति में जब तक कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिल जाता सैंधव नगरों के पतन के संदर्भ में किसी एक मत को निर्णायक रूप से सत्य मानना अपने आप में निष्पक्ष दृष्टिकोण नहीं प्रतीत होता।

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