हड़प्पा सभ्यता का धार्मिक जीवन

हड़प्पा सभ्यता के धार्मिक जीवन के बारे में हमें अधिकांश जानकारी पुरातात्विक स्रोतों-जैसे मूर्तियां, मुहरें, मृद्भाण्ड, पत्थर तथा अन्य पदार्थों में निर्मित लिंग तथा चक्र की आकृति, ताम्र फलक, कब्रिस्तान आदि से मिलती है।

हड़प्पा संस्कृति में कहीं से किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं। मोहनजोदड़ों एवं हड़प्पा से भारी मात्रा में मिली मिट्टी की मृणमूर्तियों में से एक स्त्री मृण्मूर्ति के गर्भ से एक पौधा निकलता हुआ दिखाया गया है, इससे यह मालूम होता है हड़प्पा सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मान कर इसकी पूजा किया करते थे। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मील पर तीन मुख वाला एक पुरुष ध्यान की मुद्रा में बैठा हुआ है। उसके सिर पर तीन मींग है, उसके बायीं ओर एक गैंडा और भैंसा है तथा दांयी ओर एक हाथी, एक व्याघ्र एवं हिरण है। इस चित्र से ऐसा प्रतीत होता है आज के भगवान शिव की पूजा उस समय ‘पशुपति’ के रूप में होती रही होगी। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो से मिले पत्थर के बने लिंग एवं योनि से उनकी पूजा के प्रचलन में होने का भी प्रमाण मिलता है। वृक्षपूजा के प्रमाण मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक सील पर बने पीपल की डालों के मध्य देवता से मिलता है। पशुओं में कूबड़ वाला साँड़ इस सभ्यता के लोगों के लिए विशेष पूजनीय था। अधिक मात्रा में मिली ताबीजों से ऐसा लगता है कि सिन्धु सभ्यता के लोग भूत-प्रेत एवं तंत्र-मंत्र में भी विश्वास करते थे। नागपूजा के भी प्रमाण मिले हैं। लोथल एवं कालीबंगा से हवन कुंडों एवं यज्ञवेदियों का उपलब्ध होना अग्निपूजा क प्रचलन का प्रमाण प्रस्तुत करता है।

हड़प्पा के लोगों में जो धार्मिक रीति-रिवाज प्रचलित थे, उनमें से कुछ आज भी हिन्दुओं में पाए जाते हैं। माँग में सिंदूर भरना विवाहित हिन्दू स्त्रियों के लिए सुहाग का प्रतीक है। हड़प्पा से प्राप्त एक मिट्टी की पट्टी पर एक महिष यज्ञ का दृश्य चित्रित है, जो हमें महिषासुर-मर्दिनी की याद दिलाता है। चालाक लोमड़ी और प्यासे कौवे की कहानियाँ हड़प्पा के कलशों पर चित्रित है। 

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