सिंधु घाटी सभ्यता के मुख्य स्थल

हड़प्पा

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित माण्टगोमरी जिले में रावी नदी के बायें तट पर यह पुरास्थल है। हड़प्पा में ध्वंशावशेषों के विषय में सबसे पहली जानकारी 1826 ई0 में चार्ल्स मैन्सन ने दी। 1856 ई0 में ब्रण्टन बन्धुओं ने हड़प्पा के पुरातात्विक महत्व को स्पष्ट किया। जॉन मार्शल के निर्देशन में 1921 ई0 में दयाराम साहनी ने इस स्थल का उत्खनन कार्य प्रारम्भ करवाया। 1946 में मार्टीमर व्हीलर ने हड़प्पा के पश्चिमी दुर्ग टीले की सुरक्षा प्राचीर का स्वरूप ज्ञात करने के लिए यहाँ पर उत्खनन कराया। इसी उत्खनन के आधार पर व्हीलर ने रक्षा प्राचीन एवं समाधि क्षेत्र के पारस्परिक सम्बन्धों को निर्धारित किया है। यह नगर करीब 5 किमी0 के क्षेत्र में बसा हुआ है। हड़प्पा में प्राप्त दो टीलों में पूर्वी टीले को नगर टीला तथा पश्चिमी टीले को दुर्ग टीला के नाम से सम्बोधित किया गया। हड़प्पा का दुर्ग क्षेत्र सुरक्षा-प्राचीन से घिरा हुआ था। दुर्ग का आकार समलम्व चतुर्भुज की तरह था। दुर्ग का उत्तर से दक्षिण लम्वाई 420 मी0 तथा पूर्व से पश्चिम चौड़ाई 196 मी0 है। उत्खननकर्ताओं ने दुर्ग के टीले को माउण्ट ‘AB’ नाम दिया है। दुर्ग का मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर-दिशा में तथा दूसरा प्रवेश द्वार दक्षिण दिशा में था। रक्षा-प्राचीर लगभग 12 मीटर ऊँची थी जिसमें स्थान-साथ पर तोरण अथवा बुर्ज बने हुए थे। हड़प्पा के दुर्ग के बाहर उत्तर दिशा में स्थित लगभग 6 मीटर ऊँचे टीले को ‘एफ’ नाम दिया गया है जिस पर अन्नागार, अनाज कूटने के वृत्ताकार चबूतरे और श्रमिक आवास के साक्ष्य मिले है। यहाँ पर 6 : 6 की दो पंक्तियों में निर्मित कल बारह कक्षों वाले एक अन्नागार का अवशेष प्राप्त हुआ है, जिनमें प्रत्येक का आकार 50 x 20 मी0 का है, जिनका कुल क्षेत्रफल 2,745 वर्ग मीटर से अधिक है। हड़प्पा से प्राप्त अन्नागार

नगरगढी के बाहर रावी नदी के निकट स्थित थे। हड़प्पा के ‘एफ’ टीले में पकी हुई ईंटों  से निर्मित 18 वृत्ताकार चबूतरे मिले है। इन चबूतरों में ईटों की खडे रूप में जोड़ा गया है। प्रत्येक चबूतरे का व्यास 3.20 मी0 है। हर चबूतरे में सम्भवत: आखली लगाने के लिए छेद था। इन चबूतरों के छेदों में राख जले हुए गेहूँ तथा जौ के दाने एवं भूसा के तिनके मिले है। मार्टीमर व्हीलर का अनुमान है कि इन चबूतरो का उपयोग अनाज पीसने के लिए किया जाता रहा होगा। श्रमिक आवास के रूप में विकसित 15 मकानों की दो पंक्तियां मिली हैं जिनमें उत्तरी पंक्ति में सात एवं दक्षिणी पंक्ति में 8 मकानों के अवशेष प्राप्त हुए, प्रत्येक मकान का आकार लगभग  17×7.5 मीटर का है। प्रत्येक गृह में कमरे तथा आँगन होते थे। इनमें मोहनजोदड़ों के ग्रहों की भाँति कुएँ नहीं मिले है। श्रमिक आवास के नजदीक ही करीब 14 भट्ठों – और धातु बनाने की एक मूषा (Crucible) के अवशेष मिले हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ से प्राप्त कुछ महत्वपूर्ण अवशेष—एक बर्तन पर बना मछुआरे का चित्र, शंख का बना बैल, पीतल का बना इक्का, ईंटों के वृत्ताकार चबूतरे जिनका उपयोग संभवत: फसल को दावने में किया जाता था, साथ ही गेहूँ तथा जौ के दानों के अवशेष भी मिले हैं।

हड़प्पा के सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक ऐसा कब्रिस्तान स्थित है जिसे ‘समाधि आर-37’ नाम दिया गया है। यहाँ पर प्रारम्भ में माधोस्वरूप वत्स ने उत्खनन कराया था, बाद में 1946 में व्हीलर ने भी यहाँ पर उत्खनन कराया था। यहाँ पर खुदाई से कुल 57 शवाधान पाए गए हैं। शव प्राय: उत्तर-दक्षिण दिशा में दफनाए जाते थे जिनमें सिर उत्तर की ओर होता था। एक कब्र में लकड़ी के ताबूत में लाश को रखकर यहाँ दफनाया गया था। 12 शवाधानों से कांस्य दर्पण भी पाए गए है। एक में सुरमा लगाने की सलाई, एक से सीपी की चम्मच एवं कुछ अन्य से पत्थर के फलक (ब्लेड) पाए गए है। हड़प्पा में सन् 1934 में एक अन्य समाधि मिली थी जिसे समाधि H नाम दिया गया था। इसका सम्बंध सिन्धु सभ्यता के बाद के काल से था।

मोहनजोदड़ो इस सभ्यता के ध्वंशावशेष पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के लरकाना जिले में सिन्धु नदी के दाहिने किनारे पर प्राप्त हुए हैं। यह नगर करीब 5 किमी0 के क्षेत्र में फैला हुआ है। मोहनजोदड़ो के टीलों को 1922 ई0 में खोजने का श्रेय राखालदास बनर्जी को प्राप्त हुआ। यहाँ पूर्व और पश्चिम (नगर के) दिशा में प्राप्त दो टीलों के अतिरिक्त सार्वजनिक स्थलों में एक विशाल स्नानागार एवं महत्वपूर्ण भवनों में एक विशाल अन्नागार (जिसका आकार 150 x 75 मी0 है) के अवशेष मिले है, सम्भवतः यह अन्नागार मोहनजोदड़ो के बृहेद भवनों में से एक है। हड़प्पा सभ्यता के दुर्ग क्षेत्र में स्थित यह अन्न भण्डार गृह सम्पूर्ण हड़प्पा संस्कृति माला में निर्मित पकी ईटों की विशालतम संरचना है। यह स्नानागार के पश्चिम में स्थित था। इसमें ईटों के बने हुए विभिन्न आकार-प्रकार के 27 प्रकोष्ठ मिले हैं। इसके अतिरिक्त सभाभवन एवं पुरोहित आवास के ध्वंशावशेष भी सार्वजनिक स्थलों की श्रेणी में आते हैं। पुरोहित आवास वृहत्तस्नानागार के उत्तर-पूर्व में स्थित था। मोहनजोदड़ों के पश्चिमी भाग में स्थित दुर्ग टीले को ‘स्तूप टीला’ भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ पर कुषाण शासको ने एक स्तूप का निर्माण करवाया था। मोहन जोदड़ों से प्राप्त अन्य अवशेषों में, कुम्भकारों के 6 भट्ठों के अवशेष, सूती कपड़ा, हाथी का कपाल खण्ड, गले हुए तांबे के ढेर, सीपी की बनी हुई पटरी (Scale) एवं कांसे की नृत्यरत नारी की मूर्ति के अवशेष मिले हैं। राना धुण्डई के निम्न स्तरीय धरातल की खुदाई से घोड़े के दांत के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो संभवतः सिंधु सभ्यता एवं संस्कृति से अनेक शताब्दी पूर्व के प्रतीत होते हैं। मोहन जोदड़ों नगर के ‘एच आर क्षेत्र (HR area) से जो मानव-प्रस्तर मूर्तियां मिली हैं, उसमें से दाढ़ी उयक्त सिर विशेष उल्लेखनीय है। मोहनजोदड़ों के अन्तिम चरण से नगरक्षेत्र के अन्दर मकानों तथा सार्वजनिक मार्गों पर 42 कंकाल अस्त-व्यस्त दशा में पड़े हुए मिले हैं। इसके अतिरिक्त मोहनजोदड़ों से लगभग 1398 मुहरें (मुद्राएं) प्राप्त हुयी हैं जो कुल लेखन सामग्री का 56.67 प्रतिशत अंश है। पत्थर के बने मूर्तियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शैलखड़ी से बना 19 से0 मी0 लम्बा पुरोहित का धड है। चुन्ना  पत्यर का बना एक परुष का सिर (14cm.). शैलखडी से बना एक बैठे हुए पुरुष (29.5cm.) की मूर्ति, तथा घूटनों पर हाथ रखकर बैठे हुए पुरुष की मर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त अन्य अवशेषों में सती व ऊनी कपड़े का साक्ष्य, प्रोटो-आस्ट्रोलायड या काकेशियन जाति के तीन सिर मिले है कुबड़वाले बैल की आकृति युक्त मुहरे, बर्तन पकाने के छः भट्टे, एक बर्तन पर नाव का बना चित्र था, जालीदार अंलकरण युक्त मिट्टी का बर्तन, शतरंज की छोटी, छोटी गोटियां, सीप की बनी पटरी, गले ताँबे के ढेर, गीली मिट्टी पर कपड़े का साक्ष्य,

पशुपति शिव की मूर्ति, ज्ञान की आकृति वाला मुद्रा, मोहन जोदड़ों की एक मुद्रा पर एक आकृति है जिसमें आधा भाग मानव का है तथा आधा भाग बाघ का है। एक सिल-बट्टा भी मिला है तथा मिट्टी का तराजू भी मिला है। मोहन जोदड़ों से प्राप्त पशुपति की मुहर पर बैल का चित्र अंकित नहीं है।

मोहनजोदड़ो से अभी तक समाधि क्षेत्र (अगर कोई था) के विषय में जानकारी नहीं है। मोहनजोदड़ो के नगर के अन्दर शव विसर्जन के दो प्रकार के साक्ष्य मिले है—(1) आंशिक शवाधान और (2) पूर्ण समाधीकरण (दफनाना)।

चन्हूदड़ो-

मोहनजोदड़ो के दक्षिण में स्थित चन्हूदड़ों नामक स्थान पर मुहर एवं गुड़ियों के निर्माण के साथ-साथ हड्डियों से भी अनेक वस्तुओं का निर्माण होता था। इस नगर की खोज सर्वप्रथम 1931 में गोपाल मजूमदार ने किया तथा 1943 ई0 में मैके द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया। सबसे निचले स्तर से सैधव संस्कृति के साक्ष्य मिलते हैं। यहाँ पर गुरिया निर्माण हेतु एक कारखाने का अवशेष मिला है। यहाँ पर सैन्धवकालीन संस्कृति के अतिरिक्त प्राक् हड़प्पा संस्कृति, ‘यूकर संस्कृति’ एवं ‘झांगर संस्कृति’ के भी अवशेष मिले हैं। चन्हूदड़ों से किलेबन्दी के साक्ष्य नहीं मिले है। यहां से प्राप्त अन्य अवशेषों में अलंकृत हाथी एवं कुत्ते द्वारा बिल्ली का पीछा करते हुए पद् चिह्न प्राप्त हुए हैं। सौन्दर्य प्रसाधनों में प्रयुक्त लिपिस्टिक के अवशेष भी यहाँ से मिले हैं। ताँबे और काँसे के औजार और साँचों के भण्डार मिले हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि मनके बनाने, हड्डियों की वस्तुएँ, मुद्राएं बनाने आदि की दस्तकारियाँ यहाँ प्रचलित थी। वस्तुएँ निर्मित व अर्द्धनिर्मित दोनों रूप में पाई गई जिससे यह आभास होता था कि यहाँ पर मुख्यतः दस्तकार और कारीगर लोग रहते थे। वस्तुएँ जिस प्रकार चारों ओर फैली पड़ी थी, उससे यहाँ के निवासियों के मकान छोड़कर सहसा भागने के साक्ष्य मिलते हैं। इसके अतिरिक्त चन्हुदड़ों से जला हुआ एक कपाल मिला है। चार पहियों वाली गाड़ी भी मिली है। चन्हूदड़ो की एक मिट्टी की मुद्रा पर तीन घड़ियालों तथा दो मछलियों का अंकन मिला है। यहाँ से एक वर्गाकार मुद्रा की छाप पर दो नग्न नारियों, जो हाथ में एक-एक ध्वज पकडे है तथा ध्वजों के बीच से पीपल की पत्तियाँ निकल रही हैं। यहाँ से मिली एक ईंट पर कुत्ते और बिल्ली के पंजों के निशान मिले हैं। साथ ही मिट्टी के मोर की एक आकृति भी मिली है। 

चन्हूदड़ों एक मात्र पुरास्थल है जहाँ से वक्राकार ईंटें मिली हैं। चन्हूदड़ों में किसी दुर्ग का अस्तित्व नहीं मिला है।

लोथल-

यह गुजरात के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के किनारे सरागवाला नामक ग्राम के समीप स्थित है। खुदाई 1954-55 ई0 में रंगनाथ राव के नेतृत्व में की गई। इस स्थल से समकालीन सभ्यता के पाँच स्तर पाए गए हैं। यहाँ पर दो भिन्न-भिन्न टीले नहीं मिले है, बल्कि पूरी बस्ती एक ही दीवार से घिरी थी। यह छ? खण्डों में विभक्त था। लोथल का ऊपरी नगर था नगर-दुर्ग विषम चतुर्भुजाकार था जो पूर्व से पश्चिम 117 मी0 और उत्तर से दक्षिण की ओर 136 मी0 तक फैला हुआ था। लोथल नगर के उत्तर में एक बाजार और दक्षिण में एक औद्योगिक क्षेत्र था । मनके बनाने वालों, ताँबे तथा सोने का काम करने वाले शिल्पियों की उद्योगशालाएँ भी प्रकाश में आई है। यहाँ से एक घर के सोने के दाने, सेलखड़ी की चार मुहरे, सीप एवं ताँबे की बनी चूँड़ियों और बहुत ढंग से रंगा हुआ एक मिट्टी का जार मिला है। लोथल से शंख के कार्य करने वाले दस्तकारों और ताम्रकर्मियों के कारखाने भी मिले है। नगर दुर्ग के पश्चिम की ओर विभिन्न आकार के 11 कमरे बने थे, जिनका प्रयोग मनके (Beads) या दाना बनाने के फैक्ट्री के रूप में किया जाता था। लोथल के नगर क्षेत्र के बाहर उत्तरी-पश्चिमी किनारे पर समाधि क्षेत्र का जहाँ से बीस समाधियाँ मिली हैं। यहाँ की सर्वाधिक प्रसिद्ध उपलब्धि हड़प्पाकालीन बन्दरगाह के अतिरिक्त विशिष्ट मुभाण्ड, उपकरण, मुहरें, बाट तथा माप एवं पाषाण उपकरण हैं। यहाँ तीन युग्मित समाधि के भी उदाहरण मिले हैं। स्त्री-पुरुष शवाधान के साक्ष्य भी लोथल से ही मिले हैं। लोथल की अधिकांश कब्रों में कंकाल के सिर उत्तर की ओर और पैर दक्षिण की ओर था। केवल अपवाद स्वरूप एक कंकाल का दिशा पूर्व-पश्चिम की ओर मिला हैं।

लोथल के पूर्वी भाग में स्थित बन्दरगाह (गोदी) का औसत आकार 214 x 36 मीटर तथा गहराई 3.3 मीटर है। गोदी की उत्तरी दीवाल में 12 मीटर चौड़ा एक प्रवेश द्वार था जिससे जहाज आते-जाते थे और दक्षिणी दीवाल में अतिरिक्त जल के लिए निवास द्वार था। लोथल में गढ़ी और नगर दोनों एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हैं। अन्य अवशेषों में धान (चावल), फारस की मुहरों एवं घोड़ों की लघु मृणमूर्तियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त अन्य अवशेषों में लोथल से प्राप्त एक मदभाण्ड पर एक चित्र उकेरा गया है जिस पर एक कौवा तथा एक लोमडी उत्कीर्ण है। इससे इसका साम्य पंच तंत्र की कथा चालाक लोमड़ी से किया गया है। यहाँ से उत्तर अवस्था की एक अग्निवेदी मिली है। नाव की आकार की दो महो तथा लकड़ी का अन्नागार मिला है। अन्न पीसने की चक्की, हाथी दांत तथा पीस का पैमाना मिला है। यहाँ से एक छोटा सा दिशा मापक यंत्र भी मिला है। ताँबे की पक्षी. बैल, खरगोश व कुत्ते की आकृत्तियाँ मिली है, जिसमें ताँबा का कुत्ता उल्लेखनीय है। यहाँ बटन के आकार की एक मुद्रा मिली है। लोथल से मोसोपोटामिया मूल की तीन बेलनाकार मुहरे भी मिली हैं। आटा पीसने के दो पाट मिले हैं जो पूरे सिन्धु सभ्यता का एक मात्र उदाहरण है।

उत्खननों से लोथल की जो नगर-योजना और अन्य भौतिक वस्तुएँ प्रकाश में आई है उनसे लोथल एक लघु हड़प्पा या पोहनजोदड़ों नगर प्रतीत होता है। सम्भवत: समुद्र के तट पर स्थित सिंधु-सभ्यता का यह स्थल पश्चिम एशिया के साथ व्यापार के दृष्टिकोण से सर्वोत्तम स्थल था। उत्खननों से लोथल की जो नगर-योजना और अन्य भौतिक वस्तुएं प्रकाश में आई है उनसे लोथल एक लघु हड़प्पा या मोहनजोदड़ो नगर प्रतीत होता है।

रोपड़-

पंजाब प्रदेश के रोपड़ जिले में सतलज नदी के बांए तट पर स्थित है। यहाँ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सर्वप्रथम उत्खनन किया गया था। इसका नाम रूप नगर था। 1950 में इसकी खोज बी0 बी0 लाल ने की थी। यहाँ संस्कृति के पाँच चरण मिलते हैं जो इस प्रकार हैं : हड़प्पा, चित्रित धूसर मृदभाण्ड, उत्तरी काले पालिश वाले, कुषाण, गुप्त और मध्यकालीन मृदभाण्ड। यहाँ पर हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं। इस स्थल की खुदाई 1953-56 में यज्ञ दत्त शर्मा द्वारा की गई। यहाँ प्राप्त मिट्टी के बर्तन, आभूषण चार्ट, फलक एवं ताँबे की कुल्हाड़ी महत्वपूर्ण हैं। यहाँ पर मिले मकानों के अवशेषों से लगता है कि यहाँ के मकान पत्थर एवं मिट्टी से बनाये गये थे। यहाँ शवों को अण्डाकार गड्ढ़ों में दफनया जाता था। एक स्थान से शवाधान के लिए प्रयोग होने वाले ईंटो का एक छोटा कमरा भी मिला है। कुछ शवाधानों से मिट्टी के पकाए गए आभूषण, शंख की चूँड़ियाँ, गोमेद पत्थर के मनके, ताँबे की अंगुठियाँ, आदि प्राप्त हुयी है। रोपड़ से एक ऐसा कब्रिस्तान मिला है जिसमें मनुष्य के साथ पालतू कुत्ता भी दफनाया गया था। ऐसा उदाहरण किसी भी हड़प्पाकालीन स्थल से प्राप्त नहीं हुआ है। परन्तु इस प्रकार की प्रथा नवपाषण युग में बुर्जहोम (कश्मीर) में प्रचलित थी।

कालीबंगा (काले रंग की चूड़ियाँ)—

यह स्थल राजस्थान के गंगा नगर जिले में घग्घर नदी के बाँए तट पर स्थित है। खुदाई 1953 में बी0 बी0 लाल एवं बी0 के0 थापड़ द्वारा करायी गयी। यहां पर प्राक् हड़प्पा एवं हड़प्पाकालीन संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं। हड़प्पा तथा मोहजोदड़ों की भाँति यहाँ पर सुरक्षा दीवार से धीरे दो टीले पाए गए हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह सैंधव सभ्यता की तीसरी राजधानी रही होगी। कालीबंगा के दुर्ग टीले के दक्षिणी भाग में मिट्टी और कच्ची ईटों के बने हुए पाँच चबूतरें मिले हैं जिसके शिखर पर हवन कुण्डों के होने के साक्ष्य मिले हैं। अन्य हड़प्पा कालीन नगरों की भाँति कालीबंगा दो भागों नगर दुर्ग (या गढ़ी) और नीचे दुर्ग में विभाजित था। नगर दुर्ग समानान्तर चतुर्भुजाकार था। यहाँ पर भवनों के अवशेष से स्पष्ट होता है कि यहाँ भवन कच्ची ईंटों के बने थे।

कालीबंगा में प्राक् सैंधव संस्कृति की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि एक जुते हुए खेत का साक्ष्य है जिसके कूड़ों के बीच का फासला पूर्व से पश्चिम की ओर 30 से0 मी0 है और उत्तर से दक्षिण 1.10 मीटर है। कम दूरी के खाँचों में चना एवं अधिक दूरी के खांचों में सरसों बोई जाती थी। यहाँ पर लघु पाषाण उपकरण, माणिक्य एव मिट्टी के मनके, शंख, काँच एवं मिट्टी की चूड़ियां, खिलौना गाड़ी के पहिए, साँड़ का खण्डित मृणमूर्ति, सिलबट्टे आदि पुरावशेष मिले हैं। यहाँ से प्राप्त शैलखड़ी की मुहर (सीले) और मिट्टी की छोटी मुहरे (सीलें) महत्वपूर्ण अभिलिखित वस्तुएँ थी। मिट्टी

की मुहरों पर सरकण्डे के छाप या निशान से यह लगता है कि इनका प्रयोग पैकिंग के लिए किया जाता रहा होगा। एक सील पर किसी अराध्य देव की आकृति अंकित है। यहा से प्राप्त मुहरे मेसोपोटामियाई मुहरों के समकक्ष थीं। कालीबंगा की प्राक-सैंधव कालीन बस्तियों में प्रयुक्त होने वाली कच्ची ईटें 30x20x10 से0 मी0 आकार की होती थी। यहाँ से मिले मकानों के अवशेषों के पता चलता है कि सभी मकान कच्ची इटा से बनाये गये थे. पर नाली और कओं में पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया था। यहाँ पर कुछ ईंटे अलंकृत पायी गयी है। कालीबंगा का एक फर्श पूरे हड़प्पा सभ्यता का एक मात्र उदाहरण है जहाँ अलंकृत ईटों का प्रयोग किया गया है। इस पर प्रतिच्छेदी वृत्त का अलंकरण है।

कालीबंगा के दक्षिण पश्चित में काब्रिस्तान स्थित था। यहाँ से के 37 उदाहरण मिले हैं। यहाँ अन्त्येष्ठि संस्कार की तीन विधियाँ प्रचलित थी- (1) पूर्ण समाधीकरण. (2) आशिक समाधिकरण एवं (3) दाह संस्कार । यहाँ पर बच्चे की खोपड़ी मिली है जिसमें 6 छेद हैं, इससे जल कपाली या मस्तिष्क शोध के बीमारी का पता चलता है। यहाँ से एक कंकाल मिला है जिसके बाएं घूटने पर किसी धारदार कुल्हाड़ी से काटने का निशान है। यहाँ से भूकम्प के प्राचीनतम साक्ष्य के प्रमाण मिलते है। सम्भवतः घग्घर नदी के सूख जाने से कालीबंगा का विनाश हो गया।

सुरकोतडा–

यह स्थल गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है। इसकी खोज 1964 में जगपति जोशी ने की थी। इस स्थल से सिंधु सभ्यता के पतन के अवशेष परिलक्षित होते हैं। यहाँ से प्राप्त अवशेषों में महत्वपूर्ण हैं—घोड़े की अस्थियां एवं एक अनोखी कब्रगाह । सुरकोटदा के ‘दुर्ग’ एवं ‘नगर क्षेत्र’ दोनों एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हुए थे। अन्य नगरों के विपरीत यहाँ नगर दो भागों—गड़ी तथा आवास क्षेत्र में विभाजित था। सुरकोटदा के दुर्ग को पीली कुटी हुई मिट्टी से निर्मित चबूतरे पर बनाया गया था। यहाँ पर एक कव्र बड़े आकार की शिला से ढंकी हुई मिली है। यह कव्र अभी तक ज्ञात सैंधव शव-विसर्जन परम्परा में सर्वथा नवीन प्रकार की है। दुर्गीकृत क्षेत्र के दक्षिण पश्चिम से प्राप्त एक कब्रिस्तान से कलश शवाधान का उदाहरण प्राप्त हुआ है।

आलमगीरपुर-

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में यमुना की सहायक हिण्डन नदी पर स्थित इस पुरास्थल की खोज 1958 में यज्ञ दत्त शर्मा द्वारा की गयी। आलमगीरपुर गंगा-यमुना दोआब में पहला स्थल था जहाँ से हड़प्पा कालीन अवशेष प्रकाश में आए थे। यह हड़प्पा संस्कृति का सर्वाधिक पूर्वी पुरास्थल है। यह स्थल सैंधव सभ्यता की अन्तिम अवस्था (Last phase) को सूचित करता है। यहाँ मिट्टी के बर्तन, मनके एवं पिण्ड मिले हैं। यहाँ एक गर्त से रोटी बेलने की चौकी तथा कटोरे के टुकड़े प्राप्त हुए हैं। किन्तु मातृदेवी की मूर्ति और मुद्राएं नहीं मिली है।

रंगपुर-

गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में भादर नदी के समीप स्थित इस स्थल की खुदाई 1953-54 में रंग नाथ राव द्वारा की गई। यहाँ पर पूर्व हड़प्पा कालीन संस्कृति के अवशेष मिले हैं। यहाँ मिले कच्ची ईंटों के दुर्ग, नालियां, मदभाण्ड, वाँट, पत्थर के फलक आदि महत्वपूर्ण हैं। यहाँ धान की भूसी के ढेर मिले हैं। यहाँ उत्तरोत्तर हड़प्पा संस्कृति के साक्ष्य मिलते हैं।

हड़प्पाकालीन नदियों के किनारे बसे नगर 

नगरनदी/सागर तट
मोहनजोदड़ोसिंधु नदी
हड़प्पारावी नदी
रोपड़सतलज नदी
कालीबंगाघग्घर नदी
लोथलभोगवा नदी
सुत्कागेनडोरदाश्क नदी
बालाकोटअरब सागर
सोत्का कोहअरब सागर
आलमगीरपुरहिन्डन नदी
रंगपुरमादर नदी
कोटदीजीसिंधु नदी

बनवाली-

हरियाणा के हिसार जिले में स्थित दो सांस्कृतिक अवस्थाओं के अवशेष मिले हैं। हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन इस स्थल की खुदाई 1973-74 ई0 में रवीन्द्र सिंह विष्ट के नेतृत्व में किया गया। यहाँ से संस्कृति के तीन स्तर प्रकाश में आए है प्राक् सैंधव, विकसित सैंधव तथा उत्तर सैंधव । यहाँ दुर्ग तथा निचला नगर अलग-अलग न होकर एक ही प्राचीर से घिरे थे। एक मकान से धावन पात्र (Wash basin) के साक्ष्य मिले है जो किसी धनी सौदागर के आवास की ओर संकेत करता है। एक दूसरे बड़ मकान से सोने, लाजवर्द, कार्नेनियन के मनके, छोटे बटखरे मिले है, जिससे यह ज्ञात होता है कि यह किसी जौहरी का आवास रहा होगा। यहाँ से पकी मिट्टी के बने हल का एक प्रतिरूप प्राप्त हुआ है। यहाँ अच्छे किस्म के जौ मिले हैं। इसके अतिरिक्त मिट्टी के बर्तन, गोलियां, मनके, मनुष्यों एवं पशुओं की मूर्तियां, चर्ट के फलक, कार्नीलियन के मनके, तांबे के बाणाग्र, हल की आकृति के खिलौने आदि मिले हैं। बनवाली में जल निकास प्रणाली का अभाव दिखायी देता है। बनावली की नगर-योजना शतरंज के विसात या जाल के आकार की बनायी गयी थी। सड़के न तो सीधी मिलती थी न तो एक दूसरे को समकोण पर काटती थी। 

अलीमुराद-

सिंध प्रांत में स्थित इस नगर से कुआँ, मिट्टी के बर्तन, कार्नीलियन के मनके एवं पत्थरों से निर्मित एक विशाल दुर्ग के अवशेष मिले हैं। इसके अतिरिक्त इस स्थल से बैल की लघु मृणमूर्ति एवं कांसे की कुल्हाड़ी भी मिली है।

सुत्कागेनडोर-

यह स्थल दक्षिण बलूचिस्तान में दाश्क नदी के किनारे स्थित है। हड़प्पा संस्कृति की सुदूर पश्चिमी बस्ती थी। इसकी खोज 1927 ई0 में ऑरेल स्टाइन ने की थी। हड़प्पा संस्कृति की परिपक्व अवस्था के अवशेष मिले हैं। संभवत: यह समुद्र तट पर अवस्थित एक बन्दरगाह था। यहाँ से मनुष्य की अस्थि-राख से भरा बर्तन, तांबे की कुल्हाड़ी, मिट्टी से बनी चूड़ियां एवं बर्तनों के अवशेष मिले हैं। इसका दुर्ग एक प्राकृतिक चट्टान पर बसाया गया था।

कुछ नवीन क्षेत्र (हड़प्पाकालीन सभ्यता से सम्बन्धित)

खर्वी-

अहमदाबाद से 114 कि0 मी0 की दूरी पर स्थित इस स्थान से हड़प्पाकालीन मृद्भाण्ड एवं ताम्र आभूषण के अवशेष मिले हैं।

कुनुतासी-

गुजरात के राजकोट जिले में स्थित इस स्थल की खुदाई एम0 के0 धावलिकर, एम0 आर0 आर0 रावल तथा वाई0 एम0 चितलवास द्वारा करवाई गई। यहाँ से विकसित तथा उत्तरकालीन सैन्धव कालीन स्तर प्रकाश में आए है। यहाँ से प्राप्त अवशेषों से ज्ञात होता है कि यहाँ व्यापार केन्द्र, निगरानी स्तम्भ तथा बन्दरगाह थे। खुदाई से प्राप्त अवशेषों में लम्बी सुराहियाँ, दो हत्थे कटोरे, मिट्टी के खिलौने गाड़ी आदि प्रमुख हैं। एक मकान के कमरे से सेलखड़ी के हजारों छोटे मनके तथा ताँबे की कुछ चुड़ियाँ एवं दो अंगूठी मिली हैं।

सिधु सभ्यता के प्रमुख स्थल एवं उसके खोजकर्ता 

प्रमुख स्थलखोजकर्तावर्ष
हड़प्पामाधो स्वरूप वत्स, दयाराम साहनी1921
मोहनजोदड़ोराखालदास बनर्जी1922
रोपड़यज्ञदत्त शर्मा1953
लोथलए0 रंगनाथ राव1954
कालीबंगाब्रजवासी लाल, अमलानन्द घोष1953
रंगपुरमाधोस्वरूप वत्स, रंगनाथ राव1931-1953
चन्हूदड़ोएन० गोपाल मजूमदार1931
सुरकोतडाजगपति जोशी1964
बनवालीरवीन्द्र सिंह विष्ट1973
आलमगीरपुरयज्ञदत्त शर्मा1958
कोटदीजीफजल अहमद1953
सुत्कागेनडोरऑरेल स्टाइन, जार्ज एफ0 डेल्स1927 

धौलावीरा-

इस स्थल की खुदाई से एक विशाल सैन्धव कालीन नगर के अवशेष का पता चलता है।

कोटदीजी-

सिंध प्रान्त के खैरपुर नामक स्थान पर यह स्थल स्थित है। सर्वप्रथम इसकी खोज घुर्ये (Ghurrey) ने 1935 ई0 में की। नियमित खुदाई 1953 ई0 में फजल अहमद खान द्वारा सम्पन्न करायी गयी। यहाँ से प्राक् हड़प्पा सभ्यता के अवशेष मिले हैं। सम्भवतः यहां पर पत्थरों का उपयोग घर बनाने में किया जाता था, इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि पाषाणयुगीन सभ्यता का अंत यहीं पर हुआ था।

बालाकोट–

नालाकोट से लगभग 90 किमी0 की दूरी पर बलूचिस्तान के दक्षिणी तटवर्ती पट्टी पर बालाकोट स्थित था। इसका उत्खनन 1963-1970 के बीच जार्ज एफ0 डेल्स द्वारा किया गया। यह स्थल एक बन्दरगाह के रूप में था। यहाँ से हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन अवशेष प्राप्त हुए है। इसकी नगर योजना सुनियोजित थी। भवन निर्माण के लिए मुख्यत: कच्ची ईटों का ही प्रयोग किया जाता था। बालाकोट का सबसे समृद्ध उद्योग सीप उद्योग था। खुदाई में यहाँ से हजारों की संख्या में सीप की बनी चूड़ियों के टुकड़े मिले है।

अल्लाहदीनों-

अल्लाहदीनों सिन्धु और अरब महासागर के संगम से लगभग 16 किमी0 उत्तर-पूर्व तथा कराची से पूर्व में स्थित है। 1982 में फेयर सर्विस ने यहाँ पर उत्खनन करवाया था। अल्लाहदीनों के भवन वर्गाकार अथवा आयताकार है जो बहु प्रकोष्ठीय भवनों में विभाजित है। इन भवनों के भीतर और बाहर दोनों ओर समानता है।

माण्डा–

चेनाव नद के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह विकसित हड़प्पा संस्कृति का सबसे उत्तरी ग्थल है। इसका उत्खनन 1982 में जे0 पी0 जोशी तथा मधुबाला द्वारा करवाया गया था। उत्खनन से प्राप्त यहाँ से तीन सांस्कृतिक स्तर प्राक् सैन्धव, विकसित मैंधव, तथा उत्तर कालीन सैंधव प्रकाश में आए। यहाँ विशेष प्रकार के मृद्भाण्ड (मिट्टी के बर्तन), गैर हड़प्पा से सम्बद्ध कुछ ठीकरा पक्की मिट्टी की पिण्डिकाएँ (टेराकोटा केक) आदि प्राप्त हुए हैं।

भगवानपुरा-

भगवानपुरा हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में सरस्वती नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित है। जी0 पी0 जोशी ने इसका उत्खनन करवाया था। यहाँ के प्रमुख अवशेषों में सफेद, काले तथा आसमानी रंग की काँच की चूड़ियाँ, ताँबे की चूड़ियाँ प्रमुख हैं।

देसलपुर-

गुजगत के भुज जिले में स्थित देसलपुर की खुदाई पी0 पी0 पाण्ड्या और एम0 के0 ढाके द्वारा किया गया। बाद में सौन्दरराजन द्वारा भी उत्खनन किया गया। इस नगर के मध्य में विशाल दीवारों वाला एक भवन था जिसमें छज्जे वाले कमरे थे जो किमी महत्वपूर्ण भवन को चिन्हित करता है।

रोजदी-

रोजदी गुजरात के सौराष्ट्र जिले में स्थित था। यहाँ से कच्ची ईंटों के बने चबुदरे और नालियों सहित विल्लौर (या काले भंग) एवं गोमेद पत्थर के बने बाँट गोमेद, विल्लौर के छेददार मनके और पक्की मिट्टी के मनके मिले है।

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