सिंधु घाटी सभ्यता की विशेष इमारतें

सिंधु घाटी प्रदेश में हुई खुदाई कुछ महत्वपूर्ण ध्वंसावशेषों के प्रमाण मिले हैं। हड़प्पा की खुदाई में मिले अवशेषों में महत्वपूर्ण थे—-दुर्ग, रक्षा-प्राचीर, निवासगृह, चबूतरे एवं अन्नागार आदि। नगर के पश्चिमी टीले पर सम्भवतः सुरक्षा हेतु एक दुर्ग का निर्माण हुआ था जिसकी उत्तर से दक्षिण की ओर लम्बाई 460 गज एवं पूर्व से पश्चिम की ओर लम्बाई 215 गज थी। ह्वीलर द्वारा इस टीले को माउन्ड ए-बी (Mound A-B) नाम प्रदान किया गया है। दुर्ग के चारों ओर करीब 45 फीट चौड़ी एक सुरक्षा प्राचीर का निर्माण किया गया था जिसमें जगह-जगह पर फाटकों एवं रक्षक गृहों का निर्माण किया गया था। दुर्ग का मुख्य प्रवेश का मार्ग उत्तर एवं दक्षिण दिशा में था।

मोहनजोदड़ो से प्राप्त महत्वपूर्ण इमारतें 

बृहत्स्नानागार-

इस सभ्यता का सर्वाधिक उल्लेखनीय स्मारक बृहत्स्नानागार ईंटों के स्थापत्य का सुंदर उदाहरणमोहनजोदड़ो से प्राप्त महत्वपूर्ण इमारतें है। इसकी पूर्व से पश्चिम की ओर 32.90 मीटर है, इसके मध्य में स्थित स्नानकुण्ड 11.88 | मीटर लम्वा, 7.01 मीटर चौड़ा एवं 2.44 मीटर चौड़ी सीढ़ियां बनी हैं। इस जलकुंड के अन्दर प्रवेश करने के लिए दक्षिणी और उत्तरी सिरों पर सीढ़ियाँ बनाई गई थी। फर्श पक्की ईंटों का बना हुआ था। स्नानागार के फर्श की ढाल दक्षिण से पश्चिम की ओर है। कुण्ड के चारों ओर बरामदे एवं इनके पीछे अनेक छोटे-छोटे कमरे निर्मित थे। कमरे संभवतः दुमंजिले थे, क्योंकि ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ भी मिली हैं। मैके महोदय का विचार था कि इन कमरों में पुरोहित रहते थे। कुण्ड के पूर्व में स्थित एक कमरे से ईंटों की दोहरी पंक्ति से बने एक कूप का अवशेष मिला है जो सम्भवतः स्नानागार हेतु जल की आपूर्ति करता था। मैके ने इस वृहत्स्नानागार का निर्माण धार्मिक अवसरों पर जनता के स्नान हेतु किया गया बताया। मार्शल ने इस निर्माण को तत्कालीन विश्व का एक ‘आश्चर्यजनक निर्माण’ बताया।

अनागार-

स्नानागार के पश्चिम में स्थित अन्नागार सम्भवतः मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत थी। यह सम्पूर्ण हड़प्पा संस्कृति माला में निर्मित पकी ईंटों की विशालतम संरचना है। यह अन्नागार 45.72 मीटर लम्बा एवं 22.86 मीटर चौड़ा है। इसमें हवा के संचरण की भी व्यवस्था थी। इसका मुख्य प्रवेश द्वार नदी की तरफ था, जिससे अनाज को लाकर रखने में सुविधा होती होगी। ह्वीलर ने इसे अन्नागार (Grainary) की संज्ञा दी। कुछ इतिहासकारों ने इसे राजकीय भण्डार कहा।

सभा भवन-

दुर्ग के दक्षिण में 27.43 मीटर वर्गाकार का एक विशाल सभा भवन के ध्वंसावशेष मिले हैं जिसकी छतें 20 स्तम्भों पर रुकी हैं। सम्भवतः धार्मिक सभाओं हेतु इसका उपयोग किया जाता था। मार्शल ने इसकी तुलना वौद्ध गुफा मंदिर से की, मैके ने इसका उपयोग बाजार के लिए बतलाया। भारतीय इतिहासकार दीक्षित ने इसका प्रयोग धर्म-चर्चा के लिए बतलाया।

स्नानागार के उत्तर-पूर्व में से 70.01 x 29.77 मीटर आकार के एक विशाल भवन का अवशेष मिला है जिसमें 10 मीटर वर्गाकार का एक आंगन एवं अनेक कमरे निर्मित हैं। यह भवन सम्भवतः पुरोहित आवास एवं अन्य महत्वपूर्ण अधिकारियों का निवास स्थान था। मैके ने इसे राज्यपाल के निवास हेतु निर्मित बताया।

बन्दरगाह (Dock-Yard) 

बन्दरगाह लोथल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से है। इस बन्दरगाह पर मिस्र तथा मेसोपोटामिया से जहाज आते जाते थे। इसकाऔसत आकार 214 x 36 मीटर एवं गहराई 3.3 मीटर है। बन्दरगाह के उत्तर में 12 मीटर चौड़ा एक प्रवेश-द्वार निर्मित था, जिससे होकर जहाज आते-जाते थे। अतिरिक्त पानी के निकास की भी व्यवस्था इस बंदरगाह में थी।

दुर्ग के बाहर उत्तर की ओर 6 मीटर ऊँचे ‘एफ’ नामक टीले पर पकी ईंटों से निर्मित अठारह वृत्ताकार चबूतरे मिले हैं जिसमें प्रत्येक चबूतरे का व्यास करीब 3.2 मीटर है चबूतरे के मध्य में एक बड़ा छेद है, जिसमें लकड़ी की ओखली लगी थी, इन छेदों से जौ, जले गेहूँ एवं भूसी के अवशेष मिलते हैं। इस क्षेत्र में श्रमिक आवास के रूप में पन्द्रह मकानों की दो पंक्तियां मिली हैं जिनमें सात मकान उत्तरी पंक्ति एवं आठ मकान दक्षिणी पंक्ति में मिले हैं, प्रत्येक मकान में एक आंगन एवं करीब दो कमरे के अवशेष प्राप्त हुए हैं। ये मकान आकार में 17×7.5 मीटर के थे। चबूतरों के उत्तर की ओर निर्मित अन्नागारों की दो पंक्तियां मिली हैं, जिनमें प्रत्येक पंक्ति में 6-6 कमरे निर्मित हैं, दोनों पंक्तियों के मध्य करीब 23 फुट चौड़ा एक रास्ता बना था। प्रत्येक अन्नागार करीब 15.23 मीटर लम्बा एवं 6.09 मीटर चौड़ा है, जिनका सम्पूर्ण क्षेत्रफल करीब 838.1025 वर्ग मीटर के बराबर है। 

कला

हड़प्पाई लिपि–

इस लिपि का सर्वाधिक पुराना नमूना 1853 ई0 में मिला था पर स्पष्टतः यह लिपि 1923 तक प्रकाश में आई। सिंधु लिपि में लगभग 64 मूल चिह्न एवं 250 से 400 तक अक्षर हैं जो सेलखड़ी की आयताकार मुहरों, तांबे की गुटिकाओं आदि पर मिलते हैं। यह लिपि चित्रात्मक थी। यह लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। इस लिपि में प्राप्त सबसे बड़े लेख में करीब 17 चिह्न हैं। कालीबंगाँ के उत्खनन से प्राप्त मिट्टी के ठीकरों पर उत्कीर्ण चिन्ह अपने पार्श्ववर्ती दाहिने चिन्ह को काटते है। इसी आधार पर बृज वासी लाल ने यह निष्कर्ष निकाला है कि सैंधव लिपि दाहिनी ओर से बायी ओर को लिखी जाती थी।

अभी हाल में के0 एन0 वर्मा एवं प्रो0 एस0 आर0 राव ने इस लिपि के कुछ चिह्नों को पढ़ने की बात कही है। सैन्धव सभ्यता की कला में मुहरों का अपना विशिष्ट स्थान था। अब तक कुल करीब 2000 की संख्या में मुहरें प्राप्त की जा चुकी हैं। इसमें लगभग 1200 अकेले मोहनजोदड़ों से प्राप्त हुई हैं। ये मुहरें बेलनाकार, वर्गाकार, आयताकार एवं वृत्ताकार रूप में मिली हैं। मुहरों का निर्माण अधिकतर सेलखड़ी (Stealite) से हुआ है। इस पकी मिट्टी की मूर्तियों का निर्माण चिकोटी पद्धति से किया गया है। पर कुछ मुहरे काचली मिट्टी (Faience), गोमेद, चर्ट और मिट्टी की बनी हुई भी प्राप्त हुई है। अधिकाश मुहरो पर संक्षिप्त लेख, एक श्रृगी साड़, भैस, बाघ, गैडा, हिरन, बकरी एवं हाथी के चित्र उकेरे गये हैं। इनमें से सर्वाधिक आकतियां एक श्रृंगी साड़ की उत्कीर्ण मिली हैं। लोथल और देशलपुर से ताँबे की मुहरे मिली है।

 मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पर ‘पशुपति शिव’ की आकृति बनी है। इस मुहर में एक त्रिमुखी पुरुष को एक चौकी पर पद्यासन मुद्रा में बैठे हए दिखलाया गया है। उसके सिर में सींग है तथा कलाई से कन्धे तक उसकी दोनों भुजाएँ चूड़ियों से लदी हुई है। उसके दाहिने ओर एक हाथी और एक बाघ तथा बाईं ओर एक भैंसा और एक गैंडा खड़े हुए हैं। चौकी के नीचे दो हिरण खड़े है। मोहनजोदड़ों से प्राप्त एक अन्य मुहर पर पीपल की दो शाखाओं के बीच कोई निर्वस्त्र देवी खड़ी है, इसके सामने एक भक्त घुटने के बल झुका हुआ है। इस भक्त के पीछे मानवीय मुख से युक्त एक बकरी खड़ी है और नीचे की ओर सात भक्त-गण नृत्य में मग्न दिखाए गए हैं। मोहनजोदड़ो एवं लोथल से प्राप्त एक अन्य मुहर पर ‘नाव’ का चित्र बना मिला है। हड़प्पा सीलों का सर्वाधिक प्रचलित प्रकार चौकोर है।

मोहनजोदड़ो, लोथल एवं कालीबंगा से राजमुद्रांक (Sealings) मिले हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि सम्भवत: इन मुहरों का प्रयोग उन वस्तुओं की गांठों पर मुहर लगाने में किया जाता था जिनका बाहर के देशों को निर्यात किया जाता था।

मृण्मूर्तियां 

हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त मृणमूर्तियों का निर्माण मिट्टी से किया गया है। इन मृण्मूर्तियों पर मानव के अतिरिक्त पशु पक्षियों में बैल, भैंसा, भेड़ा, बकरा, बाघ, सुअर, गैंडा, भालू, बन्दर, मोर, तोता, बतख एवं कबूतर की मृणमूर्तियां मिली हैं। मानव मृणमूर्तियां ठोस हैं पर पशुओं की खोखली। नर एवं नारी- मृणमूर्तियों में सर्वाधिक नारी मृणमूर्तियां मिली हैं। भारतीय गणराज्य में सिन्धु सभ्यता के स्थलों में केवल हरियाणा के वाणावली से दो स्त्री मृणमूर्तियाँ प्राप्त हुयी है, इसके अतिरिक्त किसी अन्य स्थल से नारी मृणमूर्तियाँ नहीं मिली है। सिन्धु सभ्यता की मिट्टी की बनी वस्तुओं में पशु-पक्षियों के रूप में बने वस्तुओं की प्रधानता है। पशुओं में बैल, भैंसा, भेड़ा, बकरा, कुत्ता, हाथी, बाघ, गैंडा, भालू, सुअर, खरगोश, बन्दर आदि की मूर्तियाँ मिली है। मोहनजोदडो से प्राप्त वृषभ की बलिष्ठ मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। डील वाले बैल की तलना में बिना डील वाले बैलों की मृणमूर्तियाँ अधिक संख्या में मिली हैं। गाय और घोड़े की मृणमूर्तियों का अभाव है। गिलहरी, सर्प, कछुवा, घडियाल तथा मछली की भी मूर्तियाँ मिली हैं। पक्षियों में मोर, तोता, कबूतर, बतख, गौरैया, मुर्गा, चील और उल्लू की मूर्तियाँ मिली हैं। हरियाणा के हिसार जिले से स्थित वाणावली से खेत की जुताई में प्रयुक्त होने वाले हल के मिट्टी के खिलौने मिले है। इस पक्की मिट्टी की मूर्तियों का निर्माण चिकोही पद्धति से किया गया है।

धातु की बनी मूर्तियां अब तक मोहनजोदड़ो, चान्हुदड़ो, लोथल एवं कालीबंगा से प्राप्त हुई हैं। मोहन जोदड़ो से प्राप्त 10 से0 मी0 लम्बी कांस्य की मूर्ति के गले में कण्ठहार सुशोभित है। सहज भाव से नृत्यरत नर्तकी का चूड़ियों से भरा बायाँ हाथ जाँघ पर एवं दाहिना हाथ, जिनमें चूड़ियां कलाई तक पहनी गयी हैं कटि पर रखे हुए हैं। इसके अतिरिक्त चान्हुदड़ो से बैलगाड़ी, इक्का गाड़ी, लोथल से ताँबे की वैल की आकृति एवं कालीबंगा से तांबे की वृषभ की आकृति मिली हैं।

प्रस्तर तथा धातु की मूर्तियाँ यद्यपि कम हैं तथापि वे कलात्मक दृष्टि से उच्चकोटि की हैं। प्रस्तर मूर्तियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध मोहनजोदड़ो से प्राप्त योगी अथवा पुरोहित की मूर्ति उल्लेखनीय है। योगी के मूंछे नहीं है किन्तु दाढ़ी विशेष रूप से सँवारी गयी है। वाँये कंधे को ढंकते हुए तिपतिया छाप वाली शाल ओढ़े हुए हैं। योगी के नेत्र अधखुले हुए हैं। उसके निचले होंठ मोटे तथा उसकी दृष्टि नाक के अग्र भाग पर टिकी हुई है। मोहनजोदड़ो से कुछ अन्य पाषाण निर्मित पशुमूर्तियाँ भी कलात्मक दृष्टि से उच्च कोटि की हैं। सर्वाधिक उल्लेखनीय श्वेत पाषाण निर्मित एक संयुक्त पशु मूर्ति है जिसमें शरीर भेड़े का तथा मस्तक हाथी का है। हड़प्पा की पाषाण मूर्तियों में दो सिर रहित मानव मूर्तियाँ उल्लेखनीय है। धातु मूर्तियों में ढलाई की जिस विधि का प्रयोग किया गया है उसे हमारे प्राचीन साहित्य में ‘मधूच्छिष्ट विधि’ कहा गया है। इसी से कालान्तर में दक्षिण की नटराज मूर्ति तथा सुल्तानगंज की बुद्ध मूर्ति का निर्माण किया गया।

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