रंगीला हरियाणा

हरियाणा की संस्कृति सतरंगी है। प्रदेश के लोक गीत, रागणी, लोकनृत्य, सांग, कहावतें, तीज-त्योहार तथा मेले इस हरियाले प्रदेश की संस्कृति को चार चांद लगाते हैं। प्रदेश के लोगों का खान-पान सादा, पहनावा पारंपरिक, चरित्र सात्विक तथा उपलब्धिया आधुनिक ह। मानव के जन्म से लेकर विवाह-शादी तथा मृत्यु तक के सभी संस्कारों में प्रदेश की संस्कृति की छटा देखने को मिलती है।

हरियाणा की समृद्ध परंपरा

सांग ‘सांग’ शब्द का मूल रूप ‘स्वांग’ है। ‘स्वांग’ मूल रूप से एक तत्सम शब्द है जिसका अर्थ है-दूसरे की हू-ब-हू नकल करने के लिए धरा गया वेश। सांग (स्वांग) हरियाणा की नाट्य परंपरा का एक प्रमुख अंग रहा है। इस संदर्भ में डॉ. शंकर लाल यादव मानते हैं कि लौकिक स्वांग के किसी धार्मिक रूप को 16वीं सदी के मध्य वैष्णव सन्तों ने अपनाया था। इस परंपरा में महाप्रभु वल्लभाचार्य ने कृष्ण अभिनय को रासलीला के रूप में प्रचारित करके गीति-नाट्य की परंपरा आरंभ की थी। इसी परंपरा में सैय्यद आगा हसन अमानत ने ‘इंदर सभा’ की रचना की थी। देश के विभिन्न प्रदेशों में लोक नाट्य की विभिन्न परंपराओं का चलन है। उदाहरणस्वरूप, जिस प्रकार ब्रज में रासलीला, बंगाल में जात्रा, महाराष्ट्र में तमाशा लोकप्रिय है, उसी प्रकार हरियाणा में सांग (स्वांग) लोक कला का महत्त्वपूर्ण रूप हैं।

हरियाणा की स्वांग परंपरा ब्रज के स्वागों से प्रभावित रही है। ब्रज के स्वांगों को हरियाणा की नौटंकी ने बहुत कुछ दिया। नौटंकी में नौ प्रकार के वाद्यों या नगाड़ों का प्रयोग होता था। नौटंकी की रसपूर्ण शैली पर लोग मुग्ध थे। समय के साथ इसी शैली में रचित स्वांग अधिक लोकप्रिय हुए। सांग की चर्चा प्राचीन साहित्य जैसे गोरखनाथ वाणीकबीर के दोहों में  तथा भी मिलती है। प्रसिद्ध सांगी मांगेराम के अनुसार सांग लेखन सर्वप्रथम 1750 ई. के आसपास किशनलाल भाट द्वारा आरंभ किया गया था। इसका आरंभिक रूप संभवत: मुजरे की तरह रहा होगा जो कालांतर में नृत्य-नाटिका से होता हुआ वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुआ।

सन् 1800 के आसपास बंसीलाल सांगी का उल्लेख मिलता है। इनके द्वारा रचित स्वांग में राजा नल, गुरु गग्गा तथा राजा गोपीचंद आदि प्रमख हैं। 1884-85 में संकलित आर.सी. टैंपल की पुस्तक ‘द लेजेंडस ऑफ पंजाब में बंसीलाल के द्वारा रचित राजा गोपीचंद नामक स्वांग का जिक्र मिलता है।

स्वांग की परंपरा को 19वीं सदी में अंबाराम नामक सांगी ने आगे बढ़ाया। 19वीं सदी में ही एक अन्य सांगी अली बख्या के नाम से हा हैं। इनके द्वारा रचित स्वांग मेरठ, अहीरवाटी तथा हरियाणा में खूब लोकप्रिय थे। अली बख्श द्वारा रचे गए स्वांग राजा नल फिसाना अजायब पद्मावत तथा कृष्ण लीला की कथाओं पर आधारित थे।

हरियाणा के अनेक भागों में शंकर लाल के स्वांग भी लोकप्रिय थे। इनके प्रमुख सांग थे–’मोर ध्वज’, ‘भगत प्रहलाद’ भरा बादल तथा रानी पद्मिनी। बालक राम सांगी ने पूरण भगत तथा राजा गोपीचन्द के किस्सों पर आधारित स्वांग रचे। प्राचीन सांग की परंपरा में कुछ अन्य प्रख्यात स्वांग थे।

 स्वांग                                                                        सांगी

कृष्ण लीला                                                             गोवर्धन सांगी

महाभारत                                                              जसवंत सिंह दिलबर

बिशना, गुलाब कली                                               कृष्ण गोस्वामी 

चन्द्र किरण, सोरठ, कंस लीला जयमल फत्ता         अहमद बख्श

20वीं सदी के प्रारंभ में हरियाणा की सांग परंपरा में पं. दीपचन्द को युग-प्रवर्तक के रूप में स्वीकार किया जाता है। इन्होंने हरियाणवी सांग को एक नई दिशा प्रदान की थी। इनका जन्म सोनीपत जिले में हुआ था तथा ये व्यवसाय से पटवारी के पद पर थे।

पंडित दीपचन्द का प्रथम सांग ‘सोरठ’ खूब लोकप्रिय हुआ। इसके अलावा पं. दीपचन्द के सांग-जानी चोर, नल-दमयंती, गोपीचंद, राजा भोज, उत्तानपाद, हरिश्चन्द्र आदि लोगों के मन बस गए थे‘सोरठ’ के किस्से पर आधारित सांग के नायक ‘कुतुबी’ को सोनीपत जिले के चालका गाव म सिक्का से तोला गया था। प्रथम विश्वयद्ध में यवाओं को सेना में भर्ती के लिए प्रोत्साहित करने हेत ब्रिटिश सरकार ने पं. दीपचन्द की प्रतिभा का उपयोग किया था। ब्रिटिश सरकार ने उनके इस कार्य से प्रसन्न होकर उन्हें ‘राय साहब’ की उपाधि दकर सम्मानित किया था।

इनसे पर्व सांग की परंपरा में दो महानायक-रामलाल खटीक तथा नेतराम जी हए। ये दोनों ही प्रारंभ में भजनी तथा कथावाचक था बाद म ये दोनों ही ‘सांग’ की विधा को समर्पित हो गए। इनके प्रमुख स्वांग थे-सीला सेठाणी, गोपीचन्द तथा पूरणभक्त।

20वीं सदी के तीसरे दशक तक आते-आते सांग के उपकरणों में भी बदलाव आ गए थे। अब खड़े रहने की बजाय ‘चौका तथा मूढ़ा का प्रयोग होने लगा था। वाद्ययंत्रों में एकतारे के स्थान पर सारंगी आई तथा ढोलक के साथ नगाडा का प्रवेश हो गया। इस नए युग में कुछ प्रख्यात सांगी पूरे उत्साह से उभरकर आए जिनमें बाजे भगत, हुक्मचन्द, हरदेव स्वामी, भरतू तथा पं. लखमीचंद आदि प्रमुख थे।

पं. लखमीचन्द स्वांग की दुनिया के उज्ज्वल सितारे थे। उन्हें हरियाणा के लोग माँ सरस्वती का साक्षात पुत्र मानते हैं। वह सभा सानिया में सर्वाधिक प्रतिभावान थे। रागनी के वर्तमान स्वरूप के जन्मदाता वास्तव में पं. लखमीचन्द ही थे। लोकभाषा में वेदान्त तथा योवन आर प्रम के मार्मिक चित्रण में उनके समकालीन कलाकारों में दूसरा कोई नहीं था। उन्हें ‘हरियाणा का शेक्सपीयर’ भी कहा जाता है।

पं. लखमीचन्द का जन्म वर्तमान सोनीपत जिले के गांव जाटी (सेरसा जाटी) में सन् 1901 में एक साधारण किसान प. उदमा के घर हुआ था। आश्चर्य की बात है कि पण्डित जी पूरी तरह अशिक्षित होने के बावजद संत कबीर की भाँति लोकज्ञान के धनी थे। पण्डित जी नेत्रहीन गायक पं. मानसिंह को अपना गुरु मानते थे। पं. लखमीचन्द के साजिंदों में धुलिया खां नामक सारंगी वादक प्रमुख थे। धूलिया खां 20 वर्ष तक पण्डित जी के सांगों में सारंगी वादन करते रहे। इन्होंने 20 के लगभग सांग रचे तथा उनमें अभिनय भी किया। पं. लखमीचन्द द्वारा रचित सांग (स्वांग) में-हरिश्चन्द्र मदनावत, नल दमयंती, सत्यवान-सावित्री, कीचक-विराट परब, भूप-पुरंजन, भगत पूरणमल, हीर-रांझा, उत्तानपाद, शकुन्तला, द्रौपदी चीर, सेठ ताराचन्द, नौटंकी, सरदार चाप सिंह, हीरामल जमाल, मीराबाई, पद्मावत, शाही लकड़हारा, राजा भोज, चन्द्रकिरण तथा जानी चोर आदि प्रमुख थे। पं. लखमीचन्द एक उच्च कोटि के रागणी गायक भी थे। उनके लिखे अधिकांश गीत सामाजिक चेतना तथा भक्ति रस से भरपूर हैं। यदि हरियाणा के बुजुर्गों की राय ली जाए तो जो स्थान उर्दू में मिर्जा गालिब, संस्कृत में कालिदास तथा अंग्रेजी में कीट्स को प्राप्त है वही स्थान हरियाणवी लोक कला में पं. लखमीचन्द को प्राप्त है।

पं. लखमी चन्द के पुत्र पं. तुले राम तथा शिष्य मांगेराम भी उच्च कोटि के सांगी रहे हैं। पं. लखमीचंद के समकालीन स्वांगी धनपतसिंह, सुलतान, रामकिशन व्यास, रामसिंह नाई, चन्दन, जमुआ मीर, रामानंद आजाद तथा होशियार सिंह भी खासे लोकप्रिय रहे। इनमें से कुछ कलाकारों द्वारा रचित प्रमुख स्वांग को यहाँ सूची बद्ध किया गया है।

   कलाकार                                        स्वांग

    मांगे राम                                     कृष्ण जन्म, ध्रुव भक्त, नवरत्न, दुष्यंत, शकुंतला 

   धनपत सिंह                                 लीलो-चमन, बणदेवी, पूरणमल, ज्ञानी चोर 

   रामकिशन ब्यास                         शरणदे नाई की, नल-दमयंती, हीरामल जमाल, गोपीचन्द, रूपकला, जादूखोरी     

स्वांग का मंचन

स्वांग में लगभग एक दर्जन वाद्य यंत्र प्रयोग होते थे जिनमें हारमोनियम, ढोलक, शहनाई, सारंगी, करताल, ढफली, बांसुरी, इकतारा, नगाडा, चिमटा, मटका, डमरू, फरोदी, खंजरी, मृदंग, मंजीरा आदि प्रमुख है। इनमें से मंजीरा, फरोदी, खंजरी तथा मृदंग अब हरियाणवी लोक संगीत गायब होने लगे हैं।

लोक कला के विशेषज्ञ सांग को प्रबंधाक्षेणी नाट्य-विद्या के रूप में मानते हैं। इसे हरियाणा का ‘ड्रैस ओपन एयर थियेटर भी सकता है। सांग में सामान्यतयाः किसी कथा-विशेष को ग्रहण करके उसके मार्मिक भावों को काव्य बद्ध किया जाता है। ये कथानक इतिहास. पौराणिक कथाओं या लोककथाओं से भी हो सकते हैं तथा स्वांगकर्ता की कल्पना के अनुसार भी। सांग में सामान्यतः 10 से 15

डॉ. शंकरलाल यादव के अनुसार स्वांग में देव-दानव, पशु-मानव सभी का यथोचित समावेश होता था।

साग में पद्य में प्रमुख रूप से भैरवी, भैरव, भूपाली, जे-जे-वन्ती, तोड़ी, कल्याण, चन्द्रकोस, मालकौस तथा असावरी और हाता था। साग में कहरवा, दादरा, तीन ताल तथा रूपक के लोकरूप का विशेष रूप से प्रयोग किया जाता था। डॉ सन्तराम देवा दाह, चमाल, भजन, काफिया, गजल, शेर, मरहठी, रागनी आदि को संजोकर चलने वाले इन सांगों में वैसे तो सभी रों को ९, किन्त वार, शगार तथा शांत रस की इनमें प्रधानता होती है।’ साग में हास्य रस उत्पन्न करने के लिए विदषक (नकली का मंचन मुख्यतः खुले आकाश तले विशेष अवसरों पर ही किया जाता है।

प्रदेश में सांग की विधा अब दम तोडने लगी है। टी.वी. सिनेमा के दौर में हरियाणा का यह लोककला अब शैक्षणिक संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों युवा उत्सवों तक सिमट कर रह गई है। देवी शंकर प्रभाकर, अरविंद स्वामो, हरीश कटारिया, भाल सिंह, रघ मलिक की कलाकारों ने इस विधा को जिन्दा रखने के प्रयास भी किए हैं परन्तु, आधुनिकता के दौर में यह विधा सचमुच पिछड़ चुकी है।

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