प्रथम विश्वयुद्ध और हरियाणा

अगस्त 1914 में ब्रिटेन सहित पूरा यूरोप प्रथम विश्वयुद्ध की चपेट में आ गया। अंग्रेजों ने भारत को भी युद्ध की आग में झोंक दिया। हजारों भारतीय सैनिकों को भी युद्ध की आग में धकेल दिया गया। दिसंबर 1914 के मद्रास अधिवेशन में भारतीय कांग्रेस ने युद्ध में अंग्रेजी सरकार के साथ खड़े होने का प्रस्ताव पास किया। हरियाणा के कांग्रेस नेताओं ने भी यही निर्णय लिया।

प्रदेश के नौजवान बड़े उत्साह से फौज में भर्ती हुए। हरियाणा के अमीरों तथा महाजनों ने दिल खोलकर ‘इंपीरियल रिलीफ फंड’ में दान दिया। प्रदेश में सर्वाधिक 10 लाख रुपये सिरसा के रायबहादुर सुखलाल ने सरकार को दान दिया। उनकी पत्नी ने भी 1 लाख रुपया चंदे के रूप में दिया। नगरों में परे प्रदेश में सर्वाधिक 25 लाख रुपये का चन्दा भिवानी जिले से एकत्र हुआ।

युद्ध के दौरान माल की माँग को पूरा करने के लिए इस दौरान भिवानी तथा हिसार में कपड़े और जगाधरी तथा रेवाड़ी में धातु के बर्तनों के कई छोटे-छोटे कारखाने भी खुल गए दूसरी ओर कुछ ऐसे नेता और संगठन भी थे जो युद्ध में सरकार की सहायता के बदले स्वराज की माँग को आगे बढ़ाने के पक्ष में थे। इन संगठनों में श्रीमती एनी बेसेंट की ‘होम रूल लीग’ भी एक थी। बाल गंगाधर तिलक ने मध्यप्रदेश और बरार के राष्ट्रवादियों की होम रूल लीग बनाई। भिवानी से पं. नेकीराम शर्मा तिलक जी के अनुयायी थे। उन्होंने तिलक जी की प्रेरणा से प्रदेश में होम रूल आंदोलन खड़ा किया।

आन्दोलन को धार देने के उद्देश्य से 1918 ई. में नेकीराम शर्मा जी ने बाल गंगाधर तिलक का हरियाणा दौरा रखवा दिया गतिविधियों से सरकार हिल गई। फलस्वरूप शर्माजी को गिरफ्तार कर लिया गया तथा तिलक जी के हरियाणा आगमन पर रोक लगा प्रकार सरकारी दमन के कारण प्रदेश में होम रूल आंदोलन दम तोड़ गया। परन्तु, यह आंदोलन भविष्य की लड़ाई के लिए प्रदेश में जमीन कर गया।

देश में सरकार विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाने हेतु ब्रिटिश सरकार रोलेट बिल लेकर आई। पूरे पंजाब में रोलेट एक्ट के विकट तीव्र प्रतिक्रिया हुई। 11 फरवरी, 1919 को सरदार झंडा सिंह की अध्यक्षता में अंबाला में एक विशाल जनसभा आयोजित हुई। इस समय में रोलेट एक्ट के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया गया। 28 फरवरी, 1919 को एक ऐसी ही सभा हिसार में भी आयोजित की गई थी। पूरे देश में विरोध के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने 18 मार्च, 1919 को ‘रोलेट एक्ट’ पारित कर दिया।

इस कानून के विरोध में पूरे देश में बड़े भारी प्रदर्शन हए। गाँधी जी ने 30 मार्च, 1919 को रोलेट एक्ट के विरोध में देशव्यापी आन्दोलन का आह्वान किया। बाद में इस तिथि को बदलकर 6 अप्रैल कर दिया गया। हरियाणा में 30 मार्च, 1919 से ही हड़तालों का क्रम आरंभ हो गया। 30 मार्च को रोहतक, करनाल, अंबाला तथा पानीपत में आंशिक हड़ताल रही। आंदोलन के दौरान जिला तथा तहसील कांग्रेस के कार्यालयों में रौलेट एक्ट के विरोध में सभाओं का आयोजन किया गया। इस आंदोलन में आर्य समाज ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। हरियाणा में आर्यसमाज के पुरोधा स्वामी श्रद्धानंद जी स्वयं इस आंदोलन में कूद पड़े।

स्वामी श्रद्धानंद जी के निमंत्रण पर 6 अप्रैल, 1919 को गाँधी जी बंबई से दिल्ली और पंजाब (हरियाणा का क्षेत्र) के दौरे पर रवाना हुए। आन्दोलन से घबराई हुई ब्रिटिश सरकार के आदेश पर गाँधी जी को 10 अप्रैल को हरियाणा में प्रवेश करते ही पलवल के रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया। ‘बापू’ की भारत में यह प्रथम राजनैतिक गिरफ्तारी थी। गाँधी जी को गिरफ्तारी की हालत में ही दूसरी रेलगाड़ी में बैठाकर मुंबई के लिए रवाना कर दिया गया। इस घटना की प्रदेश में तीव्र आलोचना हुई। रोहतक में चौधरी छोटूराम, नवलसिंह तथा बाबू लालचन्द जैन आदि नेताओं ने एक सभा के दौरान लोगों से सरकार के विरुद्ध खुले विद्रोह का आह्वान किया। सरकार ने इन सभी वकीलों के वकालत के लाइसेंस जब्त कर लिए।

13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार ने प्रदेश की जनता को और भी उग्र कर दिया। प्रदेश में जगह-जगह हिंसक घटनाएँ हुईं। अगले दिन 14 अप्रैल को बहादुरगढ़ के रेलवे स्टेशन पर लोगों ने तोड़फोड़ की, पूरे प्रदेश में टेलीग्राफ की लाइनें काट दी गईं। 19 अप्रैल को अंबाला में सिख रेजिमेंट के स्टोर में आग लगा दी गई।

सरकार ने भी प्रतिक्रिया स्वरूप सख्ती से काम लिया तथा खूब अत्याचार किए। इस दौरान अंग्रेजी सरकार ने हिसार तथा होडल में हिन्दू-मुसमलान के बीच फूट डालकर जनता की एकता तोड़ने के भी प्रयास किए। जलियांवाला बाग हत्याकांड और खिलाफल आंदोलन की उपेक्षा से क्षुब्ध गाँधी जी ने कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन (4 सितंबर, 1920) में असहयोग आन्दोलन का प्रस्ताव रखा।

लाला लाजपतराय की अध्यक्षता में हुए इस अधिवेशन में यह प्रस्ताव पास होते ही सरकार के विरोध में पुनः तेजी आ गई। अक्तूबर 1920 में पानीपत में कांग्रेस की प्रथम राजनीतिक कांफ्रेंस हुई। इस कांफ्रेस की अध्यक्षता लाला लाजपतराय जी ने की थी।

22 अक्तूबर, 1920 को बाबू मुरलीधर की अध्यक्षता में भिवानी में अंबाला डिविजनल पॉलीटिकल कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। इस कांफ्रेंस में महात्मा गाँधी, मौलाना आजाद, मौलाना मोहम्मद अली तथा शौकत अली आदि नेताओं ने भाग लिया। 8000 कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए गाँधी जी ने पहली बार भिवानी की इस कांफ्रेंस में ब्रिटिश सरकार के लिए ‘शैतानी सरकार’ शब्द का प्रयोग किया था। 6-8 नवंबर, 1920 को रोहतक में भी एक कांफ्रेंस हुई। इस कांफ्रेंस में कांग्रेस में फूट पड़ गई तथा चौधरी छोटूराम और उनके समर्थक नेता असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव में ब्रिटिश सरकार के विरोध के प्रावधानों पर मतभेद के कारण कांग्रेस से अलग हो गए। चौधरी साहब स्वदेशी आंदोलन के पक्ष में तो थे परन्तु, कर आदि न देने के प्रस्ताव के विरुद्ध थे।

इस फूट के बावजूद प्रदेश में असहयोग आंदोलन काफी लोकप्रिय रहा। अंबाला में लाला मुरलीधर ने अपना ‘रायबहादुर’ का खिताब लौटा दिया। मिर्जा नाजिर बेग, गणपत राय, गोकलचंद आदि ने कुर्सीनसीनी मेडल और प्रमाणपत्र लौटा दिए। भिवानी जिले के मिताथल निवासी अखेराम ने विरोध स्वरूप अपना रिक्रूटिंग बेज और सनद सरकार को लौटा दिए।

विद्यार्थियों ने भी असहयोग आन्दोलन में उत्साहपूर्वक भाग लिया। लाहौर लॉ कॉलेज छात्र संघ के अध्यक्ष झज्जर निवासी पं. मौलीचंद ने अपने अनेक साथियों सहित कॉलेज छोड़ दिया। पं. श्री राम शर्मा, रामफल (हिन्दू कॉलेज, दिल्ली), देशबंधू (सेंट स्टीफन कॉलेज, दिल्ली) जानकीदास (रामजस कॉलेज, दिल्ली) ने भी अपने-अपने कॉलेज छोड़ दिए। गौड़ हाई स्कूल, रोहतक तथा जाट हाई स्कूल रोहतक के विद्यार्थियों ने भी अपने-अपने स्कूल छोड़ दिए। हिन्दू हाई स्कूल, सोनीपत ने पंजाब विश्वविद्यालय से अपनी संबद्धता समाप्त कर ली। _ आन्दोलन के दौरान प्रदेश में कई राष्ट्रीय स्कूल भी स्थापित हुए।

जाट स्कूल, रोहतक के प्रधान चौ. मातूराम तथा मुख्याध्यापक बलदेवसिंह के प्रयासों से जाट स्कूल, रोहतक राष्ट्रीय स्कूल बन गया। 16 फरवरी, 1921 को इस स्कूल को देखने स्वयं गाँधी जी भी रोहतक आए। उसी दिन गाँधी जी ने रोहतक में ‘वैश्य राष्ट्रीय हाई स्कूल’ का शिलान्यास किया। भिवानी का वैश्य हाई स्कूल भी राष्ट्रीय विद्यालय बन गया।

अनेकों वकीलों ने न्यायालयों का बहिष्कार कर दिया। मई 1921 में सरकारी न्यायालय को असफल बनाने हेतु ‘राष्ट्रीय न्यायालय’ भी स्थापित किए गए। कई गाँवों में राष्ट्रीय पंचायत भी बनी।

विदेशी माल का बायकॉट किया गया तथा कांग्रेस ने पंजाब कौंसिल के चुनावों का बहिष्कार कर दिया। फरवरी 1921 में गाँधी जी ने कस्तूरबा गाँधी, मौलाना आजाद, लाला लाजपतराय आदि नेताओं के साथ पुनः हरियाणा का दौरा किया। उन्होंने 15 फरवरी, 1921 को भिवानी में एक सार्वजनिक सभा को भी संबोधित किया। तब गाँधी जी अगले दिन कलानौर होते हुए रोहतक के जाट स्कूल में आए और उसी दिन वैश्य हाई स्कूल, रोहतक की नींव रखी। रोहतक में चौ. मातूराम हुड्डा की अध्यक्षता में गाँधी जी ने एक विशाल सभा को संबाधित किया। इससे आन्दोलनकारियों में एक नए जोश का संचार हुआ।

सरकार ने आन्दोलनकारियों पर सख्त अत्याचार किए। रोहतक जिले से पं. श्रीराम शर्मा, मा. बलदेवसिंह, चौ. हरफूलसिंह, दौलतराम गुप्त, पं. जनार्दन शर्मा तथा हिसार से लाला लाजपतराय, पं. नेकीराम शर्मा, लाला गोकलचंद, के.ए. देसाई आदि सैंकड़ों नेताओं ने अपनी गिरफ्तारियाँ करनाल में लाला गणपतराय, लाला हुक्म चंद, लाला देशबंधु गुप्त तथा अंबाला जिले से लाला दुनीचंद, लाला मुरलीधर, पं. आर्यानंद शर्मा, मौ. शमीमुल्लाह आदि ने गिरफ्तारियाँ दीं।

जब आंदोलन अपने चरम पर था तो 1 फरवरी, 1922 के दिन चौरी-चौरा की घटना के बाद गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापिस ले लिया। असहयोग आंदोलन की असमय वापसी के कारण जनता में गहरी निराशा छा गई। बी.आर. दास, मोतीलाल नेहरू तथा विट्ठल भाई पटेल ने काग्रेस के अन्दर ही रहकर अलग पार्टी बना ली। उन्होंने इस पार्टी का नाम ‘स्वराज पार्टी’ रखा।

हरियाणा में स्वराज पार्टी अधिक लोकप्रिय रही। प्रदेश में स्वराज पार्टी से जुड़ने वाले नेताओं में लाला दुनीचंद, करनाल में लाला गणपतराय, हिसार में पं. नेकीराम शर्मा तथा बाबू शामलाल सत्याग्रही, गुडगाँव में पं. रूपनारायण, रोहतक में चौ. मातूराम तथा पं. श्रीराम शर्मा थे। पार्टी के प्रचार हेतु 18 मार्च, 1923 को पं. श्री राम शर्मा ने रोहतक से हरियाणा तिलक’ नामक समाचार पत्र भी निकालना आरंभ कर दिया। गुड़गाँव से शुभ चौपड़ा ने ‘स्वराज्य’ नामक अखबार निकाला। 1923 ई. में ही राजगोपालाचारी और बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने रोहतक तथा बेरी का दौरा किया।

इसी दौरान चौ. छोटूराम ने फजले हुसैन के साथ मिलकर ‘यूनियनिस्ट पार्टी’ बना ली। इस पार्टी का गाँव-देहात विशेषकर मजदूर, किसान तथा मुस्लिमों में अच्छा-खासा प्रभाव था। नवंबर 1923 के केन्द्रीय विधान परिषद् तथा पंजाब विधान परिषद् चुनावों में स्वराज पार्टी के साथ-साथ यूनियनिस्ट पार्टी भी पूरे जोश से लड़ी। इन चुनावों में यूनियनिस्ट पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तथा इस पार्टी ने 61 में से 38 सीटें जीतीं। चुनावों के उपरान्त यूनियनिस्ट नेता फजले हुसैन तथा चौ. लालचन्द (रोहतक) मंत्री बने। परन्तु, चौ. लालचंद का चुनाव मातूराम हुड्डा की याचिका पर रद्द हो गया। तत्पश्चात् चौ. छोटूराम ने लालचन्द के स्थान पर मंत्री पद की शपथ ली। 1926 के चुनावों में यूनियनिस्ट पार्टी पुनः विजयी रही। पंजाब विधान परिषद् चुनाव में यूनियनिस्ट पार्टी को भारी सफलता मिली तथा केन्द्रीय विधान परिषद् के चुनाव में पंजाब के 4 में से 2 स्थानों पर विजय हासिल की।

16 जून, 1925 को सी.आर. दास की मृत्यु के उपरान्त स्वराज पार्टी की गतिविधियाँ दम तोड़ गईं। इसके उपरांत लाला लाजपतराय जी ने पं. नेकीराम शर्मा के साथ मिलकर ‘स्वतंत्र कांग्रेस पार्टी’ की स्थापना की। इस पार्टी ने भी 1926 के चुनावों में यूनियनिस्ट पार्टी के उम्मीवारों का समर्थन किया था। स्वराज पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया। उधर चौ. छोटूराम को 1926 में मंत्री न बनाए जाने से हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में यूनियनिस्ट पार्टी कमजोर पड़ने लगी।

8 नवंबर, 1927 को सरकार ने साइमन कमीशन का गठन कर दिया। 28 फरवरी 1928 को जब साइमन कमीशन ने बंबई में कदम रखा. पूरे देश में इस कमीशन का विरोध हुआ। रोहतक, झज्जर, भिवानी, अंबाला, हिसार में हड़ताल हुई तथा जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन हुए। लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान पुलिस द्वारा किए गए लाठी चार्ज में लाला लाजपतराय गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके कछ दिन पश्चात 17 नवंबर 1928 को लालाजी की मृत्यु हो गई। इस घटना की पूरे उत्तर भारत, विशेषतः पंजाब में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। मार्च 1929 में रोहतक में डॉ. सत्यपाल की अध्यक्षता में रोहतक में कांग्रेस की प्रांतीय कांफ्रेंस हुई। इस कांफ्रेंस को पं. मोतीलाल नेहरू (विशेष अतिथि) तथा पं. जवाहरलाल नेहरू ने संबोधित किया। 10 मार्च, 1929 को रोहतक में ही प्रसिद्ध क्रांतिकारी अर्जुनलाल सेठी द्वारा ‘कृषक तथा मजदूर सम्मेलन’ का आयोजन किया गया।

1926 ई. में डॉ. सत्यपाल ने पंजाब में ‘नौजवान भारत सभा’ नामक क्रांतिकारी संगठन की नींव डाली। इसके नेताओं में अधिकतर समाजवादी विचारधारा के लोग थे जो किसान तथा मजदूर वर्ग को संगठित करके एक क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा करने को दृढ़ संकल्पित थे। हरियाणा के अनेक शहरों में नौजवान भारत सभा की शाखाएँ खुली। इन शाखाओं का संचालन अंबाला में गोपालदास, राजेन्द्रसिंह तथा सरदारसिंह ने, करनाल में देवराज. रोहतक में लक्ष्मणदास और मांगेराम वत्स, हिसार में दुर्गादास गुप्ता तथा लेखराम आदि ने किया। 23 जून, 1930 को ब्रिटिश सरकार ने ‘नौजवान भारत सभा’ पर प्रतिबंध लगा दिया।

दिसंबर 1929 में लाहौर में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का ऐतिहासिक वार्षिक अधिवेशन हुआ। इस ऐतिहासिक अधिवेशन में कांग्रेस द्वारा अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए सरकार से ‘पूर्ण स्वराज’ की माँग की गई। 26 जनवरी, 1930 को पूरे भारत में ‘स्वराज दिवस’ मनाया गया। रोहतक, झज्जर, बेरी, सोनीपत, करनाल, कैथल, जगाधरी, थानेसर, भिवानी, रेवाड़ी, हिसार तथा कालका आदि शहरों में सभाएँ हुईं तथा जुलूस निकाले गए।

वायसराय लार्ड इर्विन द्वारा गाँधी जी की मांगें ठुकराए जाने के उपरान्त गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध ‘सविनय अवतार छेड़ दिया। गाँधी जी ने इस कड़ी में नमक कानून तोड़ने का निश्चय किया। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु 12 मार्च, 1930 को गाँधी जीना कार्यकर्ताओं के साथ साबरमती आश्रम से 241 मील लंबी यात्रा आरंभ कर दी। 5 अप्रैल, 1930 को गाँधी जी डांडी पहँचे तथा अगर समुद्रतट पर नमक बनाकर 33 करोड़ भारतीयों के इस 61 वर्षीय प्रतिनिधि ने दुनिया की सबसे ताकतवर हुकूमत को चुनौती दी। तत्पश्चात उनी जगह-जगह नमक बनाकर कार्यकर्ताओं से नमक कानून तोड़ने का आह्वान किया। हरियाणा के सत्याग्रहियों ने 15 अप्रैल, 1930 को वर्तम झज्जर जिले के जाहिदपुर गाँव में नमक बनाकर प्रदेश में आन्दोलन आरंभ करने का निर्णय लिया। परन्तु, सरकार ने इस कार्यक्रम को सफल नहीं होने दिया। इससे पूर्व 13 अप्रैल, 1930 को झज्जर शहर में नमक कानून तोड़ा गया। रोहतक, बेरी, सांघी, सोनीपत, रेवाडी. गडा आदि स्थानों पर भी ऐसा ही हुआ।

नमक कानून तोड़ने के साथ-साथ विदेशी माल के बहिष्कार का अभियान भी पूरे जोश में चला। अंबाला, रोहतक तथा भिवानी के व्यापारियों ने विदेशी कपड़ों का व्यापार न करने की शपथ ली। जगह-जगह शराब के ठेकों के सामने धरने दिए गए। रोहतक में गौड़ हाई स्कूल तथा वैश्य हाई स्कूल के छात्रों ने आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। हिसार के ‘चंदूलाल एंग्लो-वैदिक स्कूल’ तथा कुरुक्षेत्र के डी.ए.वी. स्कूल के छात्रों ने आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। करनाल डी.ए.वी. स्कूल के छात्रों तथा पानीपत के जैन स्कूल के छात्रों ने सरकार के विरुद्ध जुलुस निकाले तथा खूब राजनैतिक प्रचार किया। सरकार ने आंदोलनकारियों पर खूब जुल्म किए।

कांग्रेस संगठन को अवैध घोषित कर दिया गया। ब्रिटिश सरकार ने अपने पिछलग्गू पूंजीपतियों और ठेकेदारों के माध्यम से ‘अमन सभाओं’ का गठन करवाया। परन्तु, सरकारी अत्याचार आंदोलनकारियों के हौसलों को नहीं तोड़ पाए। लगभग 600 लोगों ने नमक कानून तोड़कर गिरफ्तारियाँ दीं। इनमें से सर्वाधिक 380 आन्दोलनकारी रोहतक जिले से थे।

जब आंदोलन अपने चरम पर था, ठीक उसी समय 5 मार्च, 1931 को गाँधी जी और वायसराय लार्ड इरविन के बीच समझौता हो गया। इस समझौते को इतिहास में ‘गाँधी-इरविन पैक्ट’ के नाम से जाना जाता है। सरकार ने समझौते के अनुसार सभी राजनैतिक कैदी रिहा कर दिए, विदेशी माल के बहिष्कार की अनुमति मिल गई तथा कांग्रेस के संगठन को पुनः कानूनी मान्यता दे दी गई। परन्तु, 13 अप्रैल, 1931 को इरविन का कार्यकाल पूरा हो जाने उपरान्त नए वायसराय वेलिंग्डन ने समझौते को रद्दी की टोकरी में डाल दिया।

विवश होकर, 4 जनवरी, 1932 को गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को पुनः आरंभ कर दिया। 10 जनवरी, 1932 को लोगों ने स्वतंत्रता दिवस मनाने हेतु जुलूस निकाला। सितंबर, 1932 में गाँधी जी ने छुआछूत के विरुद्ध आन्दोलन छोड़ दिया। ब्रिटिश सरकार ने गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया। 17 सितंबर, 1932 को रोहतक में लोगों ने सभा करके जिले के सभी मन्दिरों में दलितों के प्रवेश का स्वागत किया। 18 अक्तूबर, 1932 को झज्जर में एक बड़ी सभा हुई जिसमें दलितों के मन्दिर प्रवेश के समर्थन में प्रस्ताव पास किया गया। गुड़गाँव, करनाल तथा अंबाला जिलों में भी ऐसी ही सभाएँ हुईं। सरकार ने 8 मई, 1933 को गाँधी जी को जेल से रिहा कर दिया। जेल से बाहर आते ही गांधी जी ने 12 सप्ताह के लिए सत्याग्रह को स्थगित कर दिया।

14 जुलाई, 1933 को गाँधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह आरंभ कर दिया। परन्तु, इस बार हरियाणा में आंदोलन के प्रति लोगों का उत्साह कम था। 1934-35 के केन्द्रीय विधान परिषद् तथा पंजाब विधान परिषद् चुनावों में यूनियनिस्ट पार्टी ने प्रदेश में भारी जीत हासिल की। इससे कांग्रेस और इसके संगठन को भारी क्षति पहुँची। परन्तु, देशभर में आंदोलन में कोई कमी नहीं आई। बढ़ते जनाक्रोश को शांत करने के लिए 1935 ई. में सरकार ने एक विशेष अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने प्रांतीय स्वायत्तता की दिशा में कुछ और नए प्रावधान किए। यूनियनिस्ट पार्टी ने इस अधिनियम को तुरंत स्वीकार कर लिया। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के प्रावधानों के अनुसार 1937 ई. में चुनाव हुए। पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने पं. श्रीराम शर्मा के नेतृत्व में रोहतक में ‘चुनाव बोर्ड’ स्थापित किया। यूनियनिस्ट पार्टी ने चौ. छोटूराम के नेतृत्व में, हिन्दू महासभा ने राव बलबीर सिंह तथा पं. नेकीराम शर्मा के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।

फरवरी 1937 में चुनाव हुए। शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस तथा ग्रामीण क्षेत्रों में यूनियनिस्ट पार्टी ने बाजी मारी। यूनियनिस्ट नेता सर सिकन्दर हयात खां के नेतृत्व में पंजाब में सरकार बनी। हरियाणा से चौधरी छोटूराम मंत्री बने तथा चौधरी टीकाराम संसदीय सचिव बने। कांग्रेस ने विपक्ष का दायित्व संभाला। कांग्रेस ने हार से सबक लेते हुए गाँव-देहात. में संगठन की ओर ध्यान दिया। 26-27 मार्च, 1938 को रोहतक जिले के मदीना गाँव में कांग्रेस की प्रांतीय राजनैतिक कांफ्रेंस का आयोजन किया गया।

ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस की इस सक्रियता से यूनियनिस्ट पार्टी तथा कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं में झड़प भी हुई। संगठन को बल देने के लिए 1938 ई. में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस हरियाणा के दौरे पर आए। उन दिनों हरियाणा में अकाल की स्थिति थी। उन्होंने हिसार जिले के सातरोड़ में कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे अकाल सहायता केन्द्र का निरीक्षण किया तथा वहाँ उपस्थित जनसमूह को संबोधित किया। यहाँ से ‘नेताजी’ अंबाला गए तथा अंबाला में कांग्रेस भवन की नींव रखी।

हरियाणा का आधुनिक इतिहास

 

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *