कांस्ययुगीन धौलावीरा के अतीत की संक्षिप्त यात्रा

हड़प्पा सभ्यता के पुरास्थलों में एक नवीन कड़ी के रूप में जुड़ने वाला पुरास्थल धौलावीरा कछ के रण के मध्य स्थित द्वीप ‘खडीर’ में स्थित है। इस द्वीप के समीप ही सुर्खाव शहर स्थित है। धौलावीग गांव ‘खडीर’ द्वीप के उत्तरी-पश्चिमी किनारे पर बसा है। धौलावीग पुगस्थल की खुदाई में मिले अवशेषों का प्रसार ‘मनहर’ एवं ‘मानसर’ नामक नालों के बीच में हुआ था। धौलावीरा नामक हड़प्पाई संस्कृति वाले इस नगर की योजना समानांतर चतुर्भुज के रूप में की गयी थी। इस नगर की लम्बाई पूर्व से पश्चिम की ओर है। नगर के चारों तरफ एक मजबूत दीवार के निर्माण के माक्ष्य मिलत हैं। नगर के महाप्रासाद वाले भाग के उत्तर में एक विस्तृत एवं व्यापक समतल मैदान के अवशेष मिले हैं। इसके उत्तर में नगर का मध्यम भाग है जिसे ‘पुर’ की संज्ञा दी गयी थी। इसके पूर्व में नगर का तीमग महत्वपूर्ण भाग स्थित है जिसे ‘निचला शहर’ या फिर अवम नगर कहा जाता है।

धौलावीरा की सांस्कृतिक यात्रा अनेक अवस्थाओं से गुजरती हुई एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ी थी। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि धौलावीरा सभ्यता की यात्रा करीब 1000 वर्षों की थी।

धौलावीरा सभ्यता की प्रथम अवस्था से यह आभास मिलता है कि यहाँ पर बसने वाले लोग अपने साथ एक पूर्ण विकसित सभ्यता लेकर आये थे। पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि यहां पर बसने वाले लोग सम्भवतः सिंध और बलूचिस्तान से आये थे। सभ्यता के प्रथम चरण के निवासी मिट्टी के बर्तन बनाने, तांबा शोधने, पत्थर तराशने, उपरत्नों सेलखड़ी, शंख आदि के मनके के निर्माण की विधि से अच्छी तरह परिचित थे। निर्माण (भवन आदि) के कार्यों में इस सभ्यता के लोगों ने निश्चित माप के सांचों में ढली मिट्टी की ईंटों का प्रयोग किया। ईंटों के साथ-साथ सीमित मात्रा में पत्थरों के उपयोग के भी साक्ष्य मिलते हैं। आयताकार आकार में निर्मित यहां की बस्ती के चारों ओर 11 मीटर मोटी ईंटों की प्राचीर निर्मित थी।

सभ्यता के दूसरे चरण में दुर्ग प्राचीर की अन्दर की ओर 3 मीटर चौड़ाई बढ़ा दी गयी। प्राचीर का निर्माण कच्ची ईंटों से हआ था। दीवार के अन्दर वाले भाग में सफेद, गुलाबी, गहरा गुलाबी रंग की मिट्टी की लगभग 13 परतों का लेप चढ़ाया गया है। ऐसी ही मिट्टी का प्रयोग भवन के अन्दर और बाहर की दीवारों पर पलस्तर के लिए किया गया है।

सभ्यता का तीसरा चरण भी दुर्ग की प्राचीर को मजबूती प्रदान करने के लिए अन्दर की ओर दीवार को करीब साढ़े चार मीटर चौड़ी करने के साथ ही प्रारम्भ हुआ। इस चरण में विकसित हड़प्पीय नगर सभ्यता का विकासशील स्वरूप सामने आया। सभ्यता के इस चरण में उत्तर की ओर सभ्यता के द्वितीय चरण में निर्मित बस्तियों का उजाड कर एक मैदान का निर्माण किया गया। मैदान के उत्तर की तरफ जनसामान्य के लिए योजना के अनुसार शहर का निर्माण किया गया। नगर के चारों ओर रक्षा प्राचीर एवं प्रासाद के चारों दीवारों के मध्य भाग में चार प्रवेश द्वार का निर्माण किया गया। नवीन निर्मित नगर के दोनों भागों के मध्य भागों के मध्य खुले मैदान को ‘रंग महल’ की संज्ञा दी गयी। सम्भवतः मैदान का प्रयोग सार्वजनिक एवं सामूहिक उत्सवों में किया जाता था।

सभ्यता का तीसरा चरण लगभग 300 वर्षों तक जीवित रहा। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस सभ्यता के अंतिम अर्ध शती में सम्भवतः यह नगर किसी भंयकर भूकम्प जैसे विनाशकारी प्रकोप की चपेट में आ गया, जिसके कारण नगर के कई जगह ध्वस्त हो गये, पर आर्थिक रूप से सम्पन्न होने के कारण इस सभ्यता के लोगों ने अतिशीघ्र नगर का पुनर्निर्माण कर लिया। पुनर्निर्माण के उपरान्त एक बड़े परिवर्तन के रूप में नगर का तीसरा भाग प्रकाश में आया। तीसरे भाग के प्रकाश में आने के उपरान्त पुराने शहर को ‘मध्यमनगर’ एवं नये जुड़े भाग को ‘अवम’ नाम दिया गया। सभ्यता के तीसरे चरण में ‘चित्रालंकरण वाले मृद्भाण्ड प्रयोग किये गये जो शुद्ध रूप से हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित थे। हड़प्पा सभ्यता से सम्वन्धित मुद्रायें एवं घनाकार तौलने के वांट भी पहली बार यहां पर प्रकाश में आये। बर्तन के एक टुकड़े पर हड़प्पा लिपि के भी संकेत मिलते हैं। धौलावीरा की संस्कृति के इस चरण में निःसंदेह हड़प्पा संस्कृति का विकासोन्मुख रूप पहली बार स्पष्ट रूप से इस उपमहाद्वीप में प्रकाश में आया।

धौलावीरा की बहुआयामी समृद्ध सभ्यता अपने पूरे वैभव में सभ्यता के चौथे चरण में अभिव्यक्त हुई। हड़प्पा संस्कृति में प्राप्त समस्त महत्वपूर्ण वस्तुयें सभ्यता के इस चरण में प्रचुर मात्रा में मिली हैं, जैसे कलात्मक मृद्भांड, विशिष्ट कलात्मक मुद्रायें, तौल के बाट, लिपिगत लेख, शंख, फियांस, तांबे व मिट्टी की चूड़ियां, उपरत्नों, सेलखड़ी , तांबे, सोने और पकी मिट्टी के मनके, शंख के बने विविध आभूषण, सोने के छल्ले, मिट्टी की गाड़ियां, वैल व अन्य खिलौने, कुछ विशिष्ट शैली में निर्मित मृण्मयी मानवाकृतियां आदि, पर सभ्यता के इस चरण में प्राप्त बहुतायत कलाकृतियां हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों से भिन्न हैं।

चूना पत्थर से निर्मित स्थापत्य नमूनों के कुछ अवशेष जिनमें पीली व बैंगनी रंग की धारियां निर्मित हैं, धौलावीरा की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से हैं।

 सभ्यता की पांचवी अवस्था में धौलावीरा की पूर्ण रूप से विकसित हड़प्पा की सभ्यता में पतन के लक्षण दिखायी देने लगे। सर्वप्रथम नगर आयोजन एवं स्थापत्य के क्षेत्र में गिरावट के लक्षण दिखे। सम्भवतः इस गिरावट का महत्वपूर्ण कारण था प्रशासनिक अव्यवस्था।

इस सभ्यता के पतन का सर्वाधिक बुरा प्रभाव तत्कालीन महाप्रासादों पर पड़ा जो सम्भवतः शक्ति के एक बड़े केन्द्र के रूप में इस्तेमाल किये जाते थे। ऐसा भी

अनुमान लगाया जाता है कि शायद सभ्यता के पांचवें चरण में सम्पन्न वणिक व शिल्पी समह के परिवार बेहतर अवसर की तलाश में नगर छोड़ बाहर जाने लगे। सम्भवत धौलावीरा की संस्कृति के पतन का समय 2,200 ई0 पू0 से 2000 ई0 पू0 तक रहा होगा।

कुछ समय पश्चात् धौलावीरा के टीलों पर उत्तर हड़प्पाकालीन लोगों ने अपनी बस्ती बसाई। यहां से मिली मुहरों के स्वरूप में अपने पूर्ववर्ती नगरों से प्राप्त मुहरों की अपेक्षा कुछ परिवर्तन दिखायी देता है। ये मुहरे आकार में छोटी एवं चित्रांकनहीन मिली हैं पर इन पर सुन्दर लिपि चिह्न खुदे मिले हैं। यहाँ से प्राप्त बाटों में अधिकांश संख्या ऐसे बाटों की है जिन्हें ठीक से घिस कर बनाया गया। कुंभ कला के अन्तर्गत प्राप्त पतले, सुंदर चमकीले बर्तन मिले हैं जो दक्षिणी राजस्थान की ‘आहाड़’ या बनास संस्कृति से सम्बन्धित हैं। यहां प्राप्त कुछ बर्तन ‘झूकड़शैली’ के भी हैं। धौलावीरा के अतिरिक्त इसके समकालीन सुरकोतड़ा एवं देशलपुर से भी हड़प्पाकालीन लेख युक्त मुहरें प्राप्त हुई हैं, अन्यत्र किसी पुरास्थल से इस तरह की मुहरें नहीं मिली हैं।

सभ्यता के छठे चरण में भी कुछ परिवर्तन के साक्ष्य मिले हैं। जैसे इस समय निर्माण कार्य में प्रयुक्त की जाने वाली ईंटों का कोई नाम नहीं होता था। इस समय के बने मकान सीधे प्रकार से सटाकर बनाये जाते थे, मकानों के बीच की गलियां भी पूर्णत: नये आयोजन के अनुसार बनाई गयीं, इस समय के निर्मित मकानों में हड़प्पाकालीन मकानों से निकाले गये पत्थरों का उपयोग किया गया। सम्भवत: इस समय बने मकानों की ऊँचाई कम एवं छतें लकड़ी, टहनी एवं घास-फस से बनाई जाती थीं। शंख एवं उपरत्नों के आभूषण शायद इस समय व्यापक स्तर पर निर्मित किये जाते थे। अनुमानतः धौलावीरा की हड़प्पा संस्कृति का छठा चरण सौ वर्ष तक जीवित रहा। 

सभ्यता के सातवें एवं अन्तिम चरण में लोग आयताकार मकानों में रहने की अपेक्षा वृत्ताकार मकानों को पसंद करे लगे। ‘बुंगा’ या ‘कुंभा’ कहे जाने वाले ये मकान लकड़ी एवं घास-फूस के बनाये गये थे। दीवारों को पत्थर से बनाया गया था। शायद दो से ढाई फीट की पत्थर की दीवार के ऊपर लकड़ी का गोलाकार ढाँचा खड़ा कर इसके ऊपर कुल्लेदार गोल छत बनाई जाती थी। इस तरह करीब 1000 वर्ष तक जीवित रहने वाली यह सभ्यता उजड़ने के बाद पुन: नहीं बस सकी।

धौलावीरा के प्रथम एवं द्वितीय चरण का आग्री के द्वितीय काल के द्वितीय उपकाल, नौशेरों के प्रथम काल के उत्तरार्द्ध से समीकरण स्थापित किया जा सकता है। धौलावीरा के तीसरे चरण का समीकरण आम्री के तृतीय काल के प्रथम उपकाल, नौशेरों के द्वितीय काल एवं मोहन जोदड़ों के उन स्तरों से जिनका उत्खनन 1958 में ह्वीलर के नेतृत्व में किया गया, से किया जाता है।

अपने सातवें चरण में धौलावीरा सभ्यता नगर सभ्यता से ग्रामीण सभ्यता में परिवर्तित हो गयी। धौलावीरा नगर का पूर्व से पश्चिम का विस्तार 771 मीटर एवं उत्तर से दक्षिण का विस्तार लगभग 616.80 मीटर है, प्रासाद के अन्दर पूर्व से पश्चिम में विस्तार औसतन 114 मीटर एवं उत्तर से दक्षिण में लगभग 92.50 मीटर है। धौलावीरा भारत में स्थित सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल है। सम्पूर्ण सिन्धु सभ्यता के स्थलों में क्षेत्रफल की दृष्टि से धौलावीरा का स्थान पाँचवाँ है।

प्रासाद का उत्तरी प्रवेश द्वार लगभग 16 x 11 मीटर नाप का है, इसमें जाने के लिए 79 मीटर लंबा एवं 9 मीटर चौड़ा रास्ता बनाया गया है, जो ऊपर जाते-जाते 12 मीटर चौड़ा हो जाता है।

नगर के मध्यम व अवम भाग में समकोण पर काटते रास्ते आवासीय खंडों को कई भागों में विभाजित करते हैं। यहां से प्राप्त मकानों के अन्दर अनेक कमरे, रसोईघर, स्नानगह एवं एक प्रांगण मिले है। गंदा पानी नालियों के माध्यम से बहकर सड़क पर रखे गये मटकों में इकट्ठा होता था।

यहां से मिली को भी कुछ कम अनोखी नहीं हैं। अधिकांश क आयताकार आकार में उत्तर से दक्षिण एवं पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर मिली हैं। पत्थर की अधिकता के कारण यहाँ की कब्रों के चारों तरफ विशाल शिलायें लगी मिली हैं. अब यहां से करीब छः विभिन्न तरह की को मिली हैं जिनमें एक में से भी नर-कंकाल नहीं मिले हैं जो पुरातात्विक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण जानकारी है। यहाँ से प्राप्त एक कत्र में रखे गये मृद्भाण्ड के अन्दर से कुछ राख व कोयले के छोटे-छोटे टुकड़े मिले हैं जिनसे यह अनुमान लगाया जाता है कि सम्भवतः अग्नि संस्कार के बाद बचे हुए अंश को कब्र में रखा जाता था। यहाँ से प्राप्त अनेक प्रकार की कब्रों के अवशेषो से यह संकेत मिलता है कि शायद यहाँ पर निवास करने वाले विभिन्न परम्पराओं को  मानने वाले एवं अनेक धार्मिक सम्प्रदायों के लोग थे।

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