ऋग्वैदिक काल का राजनीतिक विस्तार

डॉ0 जैकोबी के अनुसार आर्यों ने भारत में कई बार आक्रमण किया और उनकी एक से अधिक शाखाएँ भारत में आयीं। सबसे महत्वपूर्ण कबीला भरत था। इसके शासक वर्ग का नाम त्रिन्सु था। संभवतः सृजन और क्रीवी कबीले भी उनसे सम्बद्ध थे। ऋग्वेद में आर्यों के जिन पाँच कबीलों का उल्लेख है उनमें-पुरु, यदु, तुर्वस, अणु, द्रहु प्रमुख थे। ये पंचजन के नाम से जाने जाते थे। यदु और तुर्वस को दास कहा जाता था। पुरु के मधवाज (कटुवाची) कहा जाता था। यदु और तुर्वस के विषय में ऐसा माना जाता था कि इन्द्र उन्हें बाद में लाए थे। यह ज्ञात होता है कि सरस्वती दृषद्वती एवं अपाया नदी के किनारे भरत कबीले ने अग्नि की पूजा की। 

आर्यों का भौगोलिक क्षेत्र 

 भारत में आर्यों का आगमन 1500 ई0 पू0 से कुछ पहले हुआ। भारत में उन्होंने सर्वप्रथम सप्त सैन्धव प्रदेश में बसना प्रारम्भ किया। इस प्रदेश में बहने वाली सात नदियों का जिक्र हमें ऋग्वेद से मिलता है। ये हैं सिंधु, सरस्वती, शतद्रि (सतलज), वेपासा (व्यास) परुष्णी (रावी), वितस्ता (झेलम), आस्किनी (चिवाव) आदि।

कुछ अफगानिस्तान की नदियों का जिक्र भी हमें ऋग्वेद से मिलता है। ये -कुभा (काबुल), क्रुभु (कुर्रम), गोमती (गोमल) एवं सुवास्तु (स्वात) आदि। इससे

यह पता चलता है कि अफगानिस्तान भी उस समय भारत का ही अंग था। हिमालय पर्वत का स्पष्ट उल्लेख हुआ है। हिमालय की एक चोटी को मूजवन्त कहा गया है जो सोम के लिए प्रसिद्ध थी। इस प्रकार आर्य हिमालय से परिचित थे। आर्यों ने अगले पड़ाव के रूप में कुरुक्षेत्र के निकट के प्रदेशों पर कब्जा कर उस क्षेत्र का नाम – ‘ब्रह्मावर्त’ रखा। ब्रह्मावर्त से आगे बढ़कर आर्यों ने गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र एवं उसके नजदीक के क्षेत्रों पर कब्जा कर उस क्षेत्र का नाम ‘ब्रम्हर्षि देश’ रखा। इसके बाद हिमालय एवं विन्ध्याचल पर्वतों के बीच के क्षेत्र पर कब्जा कर उस क्षेत्र का नाम ‘मध्य देश’ रखा। अन्त में बंगाल एवं बिहार के दक्षिणी एवं पूर्वी भागों पर कब्जा कर समूचे उत्तर भारत पर अधिकार कर लिया, कालान्तर में इस क्षेत्र का नाम ‘आर्यावर्त’ रखा गया।

मनुस्मृति में सरस्वती और दृशद्वती नदियों के बीच के प्रदेश को ब्रह्मवर्त पुकारा गया। 

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