आर्यों के विजयी होने के कारण

आर्य निम्नलिखित कारणों से विजयी रहे—(1) घोड़े चलित रथ (2) काँसे के अच्छे उपकरण एवं (3) कवच (वर्म)।

आर्य सम्भवतः विशिष्ट प्रकार के दुर्ग का प्रयोग करते थे। इसे ‘पुर’ कहा जाता था। वे धनुष-बाण का प्रयोग करते थे। प्राय: दो प्रकार के बाणों में एक विषाक्त एवं सींग के सिरा (मुख) वाला तथा दूसरा तांबा के मुख वाला होता था। इसके अतिरिक्त बरछी, भाला, फरसा और तलवार का प्रयोग भी करते थे। पुरचरिष्णु शब्द का अर्थ था—दुर्गों को गिराने वाला। ‘दास एवं दस्यु’ आर्यों के शत्रु थे। दस्यु को अनसा (चपटी नाक वाला), अमकर्मन (वैदिक कर्मों में विश्वास न करने वाला), अयज्जवन (यज्ञ न करने वाला), अदेव (वैदिक देवता में विश्वास न करने वाला) एवं शिशनदेवा (लिंग पूजक) कहा जाता था। पुरु नामक कबीला त्रास दस्यु के नाम से जाना जाता था।

भरत जन को विश्वामित्र का सहयोग प्राप्त था। इसी सहयोग के बल पर उसने व्यास एवं शतुद्री को जीता। किन्तु शीघ्र ही भरतों ने वशिष्ठ को अपना गुरु मान लिया। अतः क्रुध होकर विश्वामित्र ने भरत जन के विरोधियों को समर्थन दिया।

परुष्णी नदी के किराने 10 राजाओं का युद्ध हुआ। इसमें भरत के विरोध में पाँच आर्य एवं पाँच अनार्य कबीले मिलकर संघर्ष कर रहे थे। आर्यों के पाँच कबीले थे-पुरु, यदु, तुर्वस, द्रुहु और अणु। पाँच अनार्य कबीले थे-अकीन्न, पक्थ, _भलानथ, विणाली, और शिवि । इसमें भरत राजा सुदास की विजय हुई। दशराजाओं का युद्ध पश्चिमोत्तर प्रदेश में बसे हुए पूर्वकालीन जन तथा ब्रह्मवर्त के उत्तर कालीन आर्यों के बीच उत्तराधिकार के प्रश्न पर लड़ा गया था। 

ऋग्वेद में करीब 25 नदियों का उल्लेख मिलता है जिनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण नदी सिंधु का वर्णन कई बार आया है। उनके द्वारा उल्लिखित दूसरी नदी है सरस्वती जो अब राजस्थान के रेगिस्तान में तिरोहित हो गयी है। इसकी जगह अब घघ्घर नदी बहती है। ऋग्वेद में सरस्वती को ‘नदीतमा’ (नदियों में प्रमुख) कहा गया है। इसके अतिरिक्त गंगा का ऋग्वेद में एक बार एवं जमुना का तीन बार जिक्र आया है। ऋग्वेद में केवल हिमालय पर्वत एवं इसकी एक चोटी मूजवंत का उल्लेख मिलता है। 

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